India-EU Trade: आर्थिक साझेदारी से रणनीतिक गठबंधन की ओर
जनवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में भारत ने बिना शोर-शराबे के वैश्विक राजनीति में एक निर्णायक हस्तक्षेप किया। 27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिया गया, जिसने दोनों पक्षों के संबंधों को एक नई दिशा दी है। इसके साथ ही व्यापक सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी पर सहमति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत–ईयू संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि एक गहरे रणनीतिक सहयोग में बदल रहे हैं।
India-EU Trade: बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका
यह समझौता ऐसे समय पर सामने आया है जब वैश्विक भू-राजनीति तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। रूस–यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में समीकरणों का पुनर्संतुलन और अमेरिका-केंद्रित सुरक्षा ढांचों पर बढ़ती शंकाएं अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पुनर्परिभाषित कर रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में यूरोपीय संघ का भारत की ओर झुकाव और भारत का बहुपक्षीय सहयोगों में सक्रिय होना, उसकी बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
India-EU Trade: मुक्त व्यापार समझौता: अवसरों का विस्तार
भारत–ईयू एफटीए लगभग सात वर्षों की जटिल वार्ताओं के बाद साकार हुआ है। इसके तहत यूरोपीय संघ भारत से होने वाले 99 प्रतिशत से अधिक निर्यात पर शुल्क समाप्त करेगा, जिससे कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण और अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिलेगा। वहीं भारत भी चरणबद्ध तरीके से यूरोपीय संघ के अधिकांश उत्पादों को बाजार में प्रवेश देगा, जिससे मशीनरी, रसायन और उच्च तकनीक वाले उत्पाद सुलभ होंगे।
इसके साथ ही सेवाओं, पेशेवरों और छात्रों की आवाजाही को सरल बनाने के प्रावधान इस समझौते को और व्यापक बनाते हैं। संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि और डेयरी को संरक्षण देकर संतुलन बनाए रखने का प्रयास भी इसमें दिखाई देता है।
सुरक्षा और रक्षा सहयोग: भरोसे की नई बुनियाद
व्यापार के साथ-साथ सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इसके माध्यम से समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद निरोध और रक्षा-औद्योगिक सहयोग के लिए संस्थागत तंत्र स्थापित किए जाएंगे। भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए यूरोपीय रक्षा परियोजनाओं में भागीदारी के अवसर खुलेंगे, जो ‘मेक इन इंडिया’ और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को मजबूती देंगे।
बहुध्रुवीय दुनिया में संतुलन का प्रयास
भारत और यूरोपीय संघ, दोनों ही आज ऐसे विकल्पों की तलाश में हैं जो उन्हें पारंपरिक गुटों पर निर्भरता से मुक्त करें। यूरोपीय संघ के लिए भारत एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और तकनीकी रूप से सक्षम साझेदार है, जबकि भारत के लिए यूरोपीय संघ के साथ सहयोग वैश्विक दबावों के बीच संतुलन बनाने का माध्यम है।
निष्कर्ष
भारत–यूरोपीय संघ समझौता केवल एक आर्थिक या रक्षा समझौता नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में नई तरह की साझेदारियों का संकेत है। यह दर्शाता है कि समान मूल्यों, साझा हितों और पूरक क्षमताओं के आधार पर लोकतांत्रिक देश मिलकर एक स्थिर, संतुलित और सहयोगपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की नींव रख सकते हैं।
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