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Strategy: विश्व व्यवस्था: आकर्षक शब्द, कमजोर अवधारणा

जब भी वैश्विक अस्थिरता बढ़ती है, तब ‘विश्व व्यवस्था’ या ‘नई विश्व व्यवस्था’ जैसे शब्द फिर से चर्चा में आ जाते हैं। हाल के दिनों में अमेरिका के राजनीतिक नेतृत्व की आक्रामक बयानबाज़ी और अप्रत्याशित निर्णयों ने इस शब्दावली को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। लेकिन इतिहास गवाही देता है कि कोई स्थायी या नैतिक वैश्विक व्यवस्था कभी अस्तित्व में नहीं रही। अंतरराष्ट्रीय संबंध हमेशा शक्ति, हित और प्रभाव के समीकरणों से संचालित होते रहे हैं। ‘विश्व व्यवस्था’ अक्सर केवल उसी शक्ति-संरचना का सुसंस्कृत नाम रही है, जिसमें ताकतवर अपने हितों को नियमों के रूप में स्थापित करता है।

Strategy: शक्ति की भाषा और साम्राज्यवादी संकेत

आधुनिक विश्व में भी शक्ति का प्रदर्शन प्रतीकों, बयानों और रणनीतिक संकेतों के माध्यम से होता है। हाल के वर्षों में अमेरिकी राजनीति में उभरे कुछ संदेश यह दर्शाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय संस्थाओं को कई बार केवल सुविधा के अनुसार स्वीकार किया जाता है। यह सोच ऐतिहासिक विडंबना से भरी है, क्योंकि अमेरिका स्वयं औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध संघर्ष से जन्मा राष्ट्र है। फिर भी आज वही शक्ति-राजनीति की उसी परंपरा को आगे बढ़ाता दिखाई देता है, जिसे वह कभी अस्वीकार करता था।

Strategy: यूरोप की नैतिकता और उसका अतीत

अमेरिकी आक्रामकता पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया यूरोप से देखने को मिलती है, लेकिन यह प्रतिक्रिया भी अपने भीतर गहरे विरोधाभास समेटे है। यूरोपीय इतिहास आक्रमणों, उपनिवेशवाद और सांस्कृतिक वर्चस्व से भरा रहा है। आज जिन मूल्यों की दुहाई दी जाती है, वे अक्सर उसी इतिहास पर परदा डालने का प्रयास प्रतीत होते हैं। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में यूरोपीय शक्तियों द्वारा किए गए शोषण और हिंसा के उदाहरण आज भी वैश्विक स्मृति में जीवित हैं। इसलिए जब नैतिकता की बात पश्चिम से आती है, तो वह कई बार आत्मावलोकन से अधिक उपदेश जैसी लगती है।

चीन का उदय और पश्चिम की रणनीतिक भूलें

वैश्विक शक्ति-संतुलन में सबसे बड़ा परिवर्तन चीन के उदय के रूप में सामने आया है। यह उभार किसी स्वाभाविक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि पश्चिमी नीतिगत निर्णयों का परिणाम भी रहा है। वैश्विक व्यापार व्यवस्था में चीन को स्थान देकर उसे उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बना दिया गया। आज वही चीन आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक रूप से चुनौती बन चुका है। उसकी आक्रामक नीतियाँ, सीमा विवाद, कर्ज आधारित कूटनीति और आंतरिक दमन वैश्विक चिंता का विषय हैं। अमेरिका की तुलना में चीन की व्यवस्था अधिक केंद्रीकृत है, जहाँ असहमति और सुधार की गुंजाइश बेहद सीमित है।

शक्ति के इस खेल में भारत की स्पष्ट राह

इस बदलते और कठोर वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए संदेश बिल्कुल साफ है—सहयोग आवश्यक है, लेकिन आत्मसमर्पण नहीं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं या आदर्शों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और शक्ति-संतुलन से संचालित होती है। भारत को किसी भी ‘नई विश्व व्यवस्था’ के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। उसे बहुपक्षीय संवाद में सक्रिय रहना है, लेकिन अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सर्वोपरि रखना होगा। दुनिया किसी नई नैतिक व्यवस्था की ओर नहीं, बल्कि उसी पुरानी सच्चाई की ओर लौट रही है जहाँ नियम वही बनाते हैं, जिनके पास शक्ति होती है। ऐसे में भारत की राह संतुलन, सतर्कता और आत्मविश्वास से होकर ही गुजरती है।

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