मकर संक्रांति पर श्रद्धा, लोकपरंपरा, सामाजिक समरसता और रोजगार का अनूठा उत्सव
By: Ravindra Sikarwar
Gorakhpur news: गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में आयोजित होने वाला खिचड़ी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, लोकसंस्कृति, मनोरंजन और रोजगार का जीवंत संगम है। मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाला यह मेला पर्व से लगभग पखवाड़ा पहले आरंभ होकर एक माह से अधिक समय तक चलता है। इस वर्ष खिचड़ी महापर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा।
सूर्य के उत्तरायण और लोकआस्था की परंपरा
सूर्यदेव के उत्तरायण होने पर महायोगी गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित करने की परंपरा पूरी तरह लोकभावना से जुड़ी मानी जाती है। मंदिर में खिचड़ी के रूप में चढ़ाया गया अन्न वर्ष भर जरूरतमंदों में वितरित किया जाता है। गोरखनाथ मंदिर का अन्नक्षेत्र इस बात का साक्षी है कि यहां से कोई भी जरूरतमंद खाली हाथ नहीं लौटता। मान्यता है कि बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर मन्नत मांगने वाला भक्त कभी निराश नहीं होता।
त्रेतायुग से जुड़ी कथा
गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा को त्रेतायुगीन माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, एक बार आदियोगी गुरु गोरखनाथ हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी के धाम पहुंचे। मां ने उनके लिए विविध व्यंजनों की व्यवस्था की, लेकिन योगी स्वरूप में बाबा ने भिक्षा में प्राप्त अन्न को ही भोजन स्वीकार करने की इच्छा जताई। उन्होंने मां से जल गर्म करने का अनुरोध किया और स्वयं भिक्षाटन पर निकल पड़े।
भिक्षा मांगते हुए बाबा गोरखपुर पहुंचे और राप्ती व रोहिणी नदी के तटवर्ती क्षेत्र में साधनालीन हो गए। उनके तेज से प्रभावित होकर लोगों ने उनके खप्पर में चावल और दाल का दान दिया। मकर संक्रांति आने पर यही परंपरा खिचड़ी पर्व के रूप में स्थापित हो गई, जो तब से निरंतर चली आ रही है। लोकविश्वास है कि आज भी मां ज्वाला देवी के धाम में बाबा की खिचड़ी के लिए जल उबल रहा है।
विधि-विधान और आस्था का क्रम
मकर संक्रांति की भोर में सबसे पहले गोरक्षपीठ की ओर से पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित करते हैं। इसके पश्चात नेपाल राजपरिवार की ओर से लाई गई खिचड़ी चढ़ाई जाती है। फिर मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं और देश-विदेश से आए भक्त बाबा को खिचड़ी निवेदित करते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, देश के विभिन्न हिस्सों और पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से लाखों श्रद्धालु इस पर्व में सहभागिता करते हैं।
सामाजिक समरसता का प्रतीक
गोरखनाथ मंदिर सामाजिक सौहार्द का ऐसा केंद्र है जहां जाति, धर्म और पंथ की सीमाएं स्वतः ही मिटती दिखाई देती हैं। मंदिर परिसर में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग समान रूप से दुकानों और सेवाओं से जुड़े हैं। खिचड़ी मेला हजारों लोगों के लिए आजीविका का साधन बनता है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय की भी बड़ी भागीदारी रहती है। यहां किसी प्रकार का भेदभाव नहीं, बल्कि आपसी अपनत्व का भाव देखने को मिलता है।
मेला, मनोरंजन और रोजगार
खिचड़ी मेले में पूजा-पाठ के साथ-साथ खरीदारी और मनोरंजन की भी भरपूर व्यवस्था होती है। खिलौने, हस्तशिल्प, खान-पान और झूलों से सजा मेला परिसर श्रद्धालुओं और पर्यटकों से गुलजार रहता है। मंदिर और मेला क्षेत्र पूरी तरह सुसज्जित होकर इस लोकपर्व का स्वागत करता है।
इस प्रकार गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, लोकसंस्कृति और आर्थिक गतिविधियों का सशक्त प्रतीक बनकर उभरता है।

