By: Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर जलाने और अपमानजनक नारेबाजी के वीडियो वायरल होने के बाद सामाजिक तनाव बढ़ गया है। इस घटना ने दलित समुदाय और विभिन्न संगठनों में व्यापक गुस्सा पैदा कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप शहर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए त्वरित कार्रवाई की और सीनियर एडवोकेट अनिल मिश्रा सहित कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने इसे अपर्याप्त बताते हुए सख्त सजा की मांग की है।
यह घटना हाल ही में सामने आई, जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो प्रसारित हुआ जिसमें कुछ लोग डॉ. आंबेडकर की तस्वीर को जलाते और आपत्तिजनक टिप्पणियां करते दिखाई दिए। वीडियो के वायरल होते ही दलित समाज में आक्रोश फैल गया। साइबर सेल ने शिकायत मिलने पर तुरंत एफआईआर दर्ज की, जिसमें कुल सात से आठ लोगों के नाम शामिल हैं। मुख्य आरोपी के रूप में नामित व्यक्ति पर गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई हुई। पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां एक को स्वास्थ्य आधार पर राहत मिली और बाकियों को हिरासत में भेजा गया।
प्रदर्शन का केंद्र बिंदु कलेक्ट्रेट परिसर रहा, जहां भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी और अन्य सामाजिक संगठनों के सैकड़ों कार्यकर्ता एकत्र हुए। उन्होंने कई घंटों तक धरना दिया और नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि सिर्फ मुकदमा दर्ज करना काफी नहीं है; आरोपियों पर कठोर कानूनी प्रावधान लागू किए जाएं। विशेष रूप से मुख्य आरोपी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसी सख्त धाराएं लगाने की मांग जोरदार तरीके से उठाई गई। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। अंततः अधिकारियों ने कार्रवाई का आश्वासन दिया, जिसके बाद धरना समाप्त हुआ।
यह मामला ग्वालियर में पहले से चल रहे सामाजिक मुद्दों से जुड़ा प्रतीत होता है। शहर में डॉ. आंबेडकर से संबंधित विषय अक्सर विवाद का कारण बनते हैं, जैसे उनकी प्रतिमा स्थापना या बयानबाजी। इन घटनाओं ने समाज के विभिन्न वर्गों में विभाजन को उजागर किया है। एक ओर जहां दलित और बहुजन संगठन संविधान के रक्षक की गरिमा बनाए रखने की बात करते हैं, वहीं कुछ लोग अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कृत्य सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाते हैं और कानून को अपना काम करने देना चाहिए।
पुलिस प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए व्यापक इंतजाम किए। संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बल तैनात किया गया और सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। भड़काऊ सामग्री को हटाने और शांति भंग करने वालों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी और दोषियों को सजा मिलेगी। शहरवासी उम्मीद कर रहे हैं कि प्रशासन और समाज के नेता मिलकर ऐसे विवादों को सुलझाएंगे ताकि शांति बनी रहे।
यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि सामाजिक मुद्दों पर संवेदनशीलता कितनी जरूरी है। डॉ. आंबेडकर न केवल दलित समाज के प्रतीक हैं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए समानता और न्याय के आदर्श हैं। उनका अपमान पूरे समाज की एकता को चुनौती देता है। दूसरी ओर, कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए संवाद और जागरूकता से ऐसे मामलों को रोका जा सकता है। ग्वालियर जैसे शहरों में जहां विविधता है, वहां सद्भाव बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। उम्मीद है कि यह मामला जल्द सुलझेगा और समाज आगे बढ़ेगा।
