By: Ravindra Sikarwar
बांग्लादेश में हाल के दिनों में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ लक्षित हिंसा की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं, जो मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन को दर्शाती हैं। शरियतपुर जिले में नए साल की पूर्व संध्या पर 50 वर्षीय हिंदू व्यवसायी खोकोन चंद्र दास पर हमला किया गया। उपद्रवियों ने उन्हें तेज धारदार हथियारों से घायल किया, पेट्रोल डालकर आग लगा दी। गंभीर रूप से झुलसे खोकोन ने पास के तालाब में छलांग लगाकर अपनी जान बचाई, लेकिन उन्हें गंभीर चोटें आईं और इलाज के लिए ढाका रेफर किया गया। उनकी पत्नी सीमा दास का आरोप है कि हमलावरों को खोकोन ने पहचान लिया था, इसलिए उन्हें मारने की कोशिश की गई। पुलिस ने दो संदिग्धों की पहचान की है और जांच जारी है।
यह घटना दिसंबर 2025 के अंतिम दिनों में हिंदुओं पर हुए हमलों की श्रृंखला की नवीनतम कड़ी है। पिछले 15 दिनों में कम से कम तीन से चार लक्षित हमले दर्ज किए गए हैं। 18 दिसंबर को मायमेनसिंह जिले के भालुका इलाके में 27 वर्षीय हिंदू गारमेंट कर्मचारी दीपू चंद्र दास की भीड़ ने ईशनिंदा के आरोप में पीट-पीटकर हत्या कर दी और शव को पेड़ पर लटकाकर आग लगा दी। जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई, फिर भी यह क्रूर घटना हुई। इसके कुछ दिन बाद, 24 दिसंबर को राजबाड़ी जिले के होसेनडांगा गांव में 29 वर्षीय अमृत मंडल उर्फ सम्राट को भीड़ ने पीटकर मार डाला। पुलिस ने इसे फिरौती मांगने से जुड़ा बताया, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय में इसे सांप्रदायिक हमला माना जा रहा है।
इनके अलावा, 30 दिसंबर के आसपास मायमेनसिंह में एक हिंदू गारमेंट फैक्ट्री गार्ड बजेंद्र बिस्वास को सहकर्मी ने गोली मार दी। यह 12 दिनों में हिंदुओं की तीसरी हत्या थी। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स के अनुसार, जून से दिसंबर 2025 तक ईशनिंदा के आरोपों से जुड़े 71 हमले हिंदुओं पर हुए, जिनमें मॉब वायलेंस, घरों-मंदिरों में तोड़फोड़ और हत्याएं शामिल हैं। अंतरिम सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों पर 2,900 से अधिक हमलों के दस्तावेज दर्ज हैं।
शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है। अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने इन घटनाओं की निंदा की है और कुछ को गैर-सांप्रदायिक बताया, जैसे अमृत मंडल की हत्या को अपराधी गतिविधियों से जोड़ा। हालांकि, अल्पसंख्यक संगठन और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इसे लक्षित हमलों का पैटर्न मानते हैं। कट्टरपंथी तत्वों के बढ़ते प्रभाव से कानून-व्यवस्था कमजोर हुई है, जिससे हिंदू समुदाय में डर का माहौल है। कई रिपोर्ट्स में घर जलाने, संपत्ति लूटने और जबरन विस्थापन की घटनाएं सामने आई हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन घटनाओं की कड़ी निंदा हुई है। अमेरिका ने दीपू दास की हत्या को ‘भयावह’ बताकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। भारत ने लगातार चिंता जताई है और कहा कि चरमपंथियों द्वारा अल्पसंख्यकों पर हमले गंभीर हैं। विदेश मंत्रालय ने दोषियों को सजा और सुरक्षा के लिए दबाव बनाने की बात कही। पड़ोसी देश होने के नाते भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी असर पड़ रहा है, खासकर अवैध घुसपैठ और व्यापारिक मुद्दों पर।
ये घटनाएं न केवल बांग्लादेश के संवैधानिक सिद्धांतों – धर्मनिरपेक्षता और समानता – पर सवाल उठाती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन भी हैं। अल्पसंख्यकों को सुरक्षित जीवन और अधिकारों का प्रयोग बिना भेदभाव के मिलना चाहिए। अंतरिम सरकार की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष जांच कराए, दोषियों को सजा दे और समुदायों के बीच समरसता बहाल करे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि ऐसी हिंसा रुके और बांग्लादेश में शांति स्थापित हो। यदि ये हमले नहीं रुके, तो क्षेत्रीय स्थिरता पर गहरा असर पड़ेगा। अल्पसंख्यक सुरक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है, और इसका सम्मान जरूरी है।
