By: Ravindra Sikarwar
MP news: मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की महत्वाकांक्षी पहल से शुरू हुई राज्य मंत्रियों की कार्यकर्ताओं से सीधी बातचीत की व्यवस्था अब कमजोर पड़ती दिख रही है। इस योजना का उद्देश्य सत्ता और संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना था, लेकिन अब न तो मंत्री नियमित रूप से उपस्थित हो रहे हैं और न ही कार्यकर्ता इसमें पहले जैसी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
यह व्यवस्था 1 दिसंबर 2025 से लागू हुई थी, जब प्रदेशभर से भोपाल आने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनने और उनके मुद्दों का समाधान करने के लिए सोमवार से शुक्रवार तक दोपहर 1 से 3 बजे तक दो-दो मंत्रियों की ड्यूटी प्रदेश भाजपा कार्यालय में लगाई गई। दिलचस्प संयोग यह था कि इसी दिन से विधानसभा का शीतकालीन सत्र भी आरंभ हुआ, जिसके चलते शुरुआती दिनों में यह कार्यक्रम काफी नियमित और प्रभावी रहा।
पहले सप्ताह का कार्यक्रम कुछ इस प्रकार था:
- 1 दिसंबर को उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और राज्य मंत्री गौतम टेटवाल ने कार्यकर्ताओं से मुलाकात की।
- 2 दिसंबर को लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह तथा मंत्री दिलीप अहिरवार मौजूद रहे।
- 3 दिसंबर को खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास सारंग और सहकारिता मंत्री लखन पटेल ने सुनवाई की।
- 4 दिसंबर को नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तथा राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी उपस्थित हुए।
- 5 दिसंबर को जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह और नरेंद्र शिवाजी पटेल ने कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनीं।
यह शुरुआती दौर काफी उत्साहजनक था। प्रत्येक कैबिनेट और राज्य मंत्री को सप्ताह में निर्धारित समय पर कार्यालय में दो घंटे बिताने का निर्देश था। पार्टी नेतृत्व का स्पष्ट मत था कि कार्यकर्ता व्यक्तिगत शिकायतों के बजाय अपने क्षेत्र की सामूहिक और स्थानीय समस्याओं को उठाएं, ताकि त्वरित निराकरण हो सके।
हालांकि, विधानसभा सत्र समाप्त होने के बाद यह व्यवस्था धीरे-धीरे लय खोने लगी। मंत्रियों की व्यस्तताएं बढ़ीं और उनकी उपस्थिति अनियमित हो गई। पहले जहां दो मंत्री एक साथ आते थे, बाद में केवल एक ही दिखाई देने लगा। कार्यकर्ताओं की संख्या भी घटने लगी, क्योंकि ज्यादातर लोग निजी आवेदन या छोटी-मोटी शिकायतें लेकर आते थे, जबकि पार्टी का फोकस सामूहिक मुद्दों पर था।
सुनवाई के दौरान मंत्री शुरूआती समय में शिकायतें सुनते थे, लेकिन बाकी समय अनौपचारिक बातचीत या कार्यकर्ताओं से गपशप में बीत जाता था। दिसंबर मध्य में खजुराहो में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक और विभागीय समीक्षा बैठकों के कारण भी कई दिन यह व्यवस्था प्रभावित रही। अंततः 30 दिसंबर को केवल राज्य मंत्री कृष्णा गौर अकेले उपस्थित हुईं। उसके बाद से सोमवार से शुक्रवार के निर्धारित दिनों में मंत्री कार्यालय पहुंचने में पूरी तरह अनुपस्थित रहे।
यह स्थिति पार्टी के लिए चिंता का विषय बन गई है। प्रदेश अध्यक्ष की यह पहल संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन अब यह ठप पड़ती नजर आ रही है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि मंत्री नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होंगे, तो इस व्यवस्था का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा। दूसरी ओर, मंत्रियों की व्यस्त दिनचर्या और सरकारी दायित्वों को भी इसका कारण माना जा रहा है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, नेतृत्व इस मुद्दे पर विचार कर रहा है कि कैसे इस व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाया जाए। कार्यकर्ताओं का सीधा संपर्क सरकार तक पहुंचाना भाजपा की मजबूती का आधार रहा है, और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में संगठन-सत्ता समन्वय बेहद जरूरी है। यदि यह योजना पूरी तरह बंद हो गई, तो यह पार्टी के आंतरिक तालमेल पर सवाल उठा सकती है। आने वाले दिनों में प्रदेश नेतृत्व द्वारा नई रणनीति अपनाई जा सकती है, ताकि कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे और संगठन मजबूत हो।
यह घटनाक्रम दर्शाता है कि अच्छी शुरुआत के बावजूद योजनाओं को निरंतर बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण होता है। भाजपा जैसे बड़े संगठन में ऐसे प्रयोग नए आयाम खोलते हैं, लेकिन उनकी सफलता नियमितता और प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है।
