By: Ravindra Sikarwar
MP news: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हाल ही में हुए कुछ सरकारी आयोजनों ने पत्रकारिता की छवि को गंभीर रूप से धूमिल कर दिया है। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में छोटे-मोटे उपहारों – जैसे थैले या स्टेशनरी – के लिए जिस तरह की अफरा-तफरी और धक्का-मुक्की देखी गई, वह पूरे मीडिया जगत के लिए शर्मनाक है। ये दृश्य न केवल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, बल्कि देशभर में भोपाल की पत्रकारिता पर तरह-तरह के व्यंग्यात्मक और नकारात्मक कमेंट्स का कारण बन रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या ये लोग वाकई पत्रकार हैं, या सिर्फ उपहार बटोरने के लिए मीडिया का लबादा ओढ़े हुए हैं?
मोहन यादव सरकार के दो वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विभिन्न मंत्रियों ने अपनी-अपनी विभागीय उपलब्धियां गिनाने के लिए पत्रकार वार्ताएं आयोजित कीं। उद्देश्य स्पष्ट था – सरकार की सफलताओं और योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाना। लेकिन आयोजन का स्वरूप कई जगह मेले जैसा हो गया। कुशाभाऊ ठाकरे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में हुई कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद का नजारा बेहद असहज करने वाला था। जैसे ही मंत्री अपनी बात खत्म करते, उपहार वितरण शुरू होता और वहां मौजूद कुछ लोग थैलों या गिफ्ट पैक्स के लिए टूट पड़ते। टेबलों पर चढ़ना, धक्का-मुक्की करना, एक-दूसरे से छीनझपटाई करना – ये दृश्य किसी बाजार की लूट से कम नहीं लगते।
ऐसा सिर्फ एक आयोजन में नहीं हुआ। मंत्री चैतन्य काश्यप, विजय शाह, तुलसी सिलावट, दिलीप अहिरवार और प्रदीप जायसवाल जैसे कई मंत्रियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही हाल रहा। इन वीडियोज में साफ दिख रहा है कि उपहार बांटने की टेबल के आसपास भगदड़ मच जाती है। कुछ लोग तो परिवार के सदस्यों के साथ आए थे, ताकि ज्यादा से ज्यादा सामान मिल सके। यह सब देखकर लगता है कि इन आयोजनों का मुख्य आकर्षण सरकार की उपलब्धियां नहीं, बल्कि मुफ्त का माल बन गया है।
कथित पत्रकारों की भीड़: असली मीडिया कहां है?
सामान्य रूप से सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रमुख दैनिक अखबारों, टीवी चैनलों और विश्वसनीय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रतिनिधि आमंत्रित किए जाते हैं। लेकिन भोपाल में हो रहे इन आयोजनों में स्थिति बिल्कुल उलट है। यहां मार्केटिंग करने वाले, लोकल केबल ऑपरेटर, ऑटो रिक्शा चालक, किराना दुकानदार, आरटीआई कार्यकर्ता, बिरयानी विक्रेता और यहां तक कि अंडा बेचने वाले लोग भी ‘पत्रकार’ बनकर पहुंच जाते हैं। इनमें से कई के पास कोई मान्यता प्राप्त प्रेस कार्ड नहीं होता, न ही वे नियमित रूप से कोई न्यूज कवरेज करते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य उपहार हासिल करना होता है।
हाल ही में वन विभाग के एक आयोजन में तो आयोजकों को उपहार बांटने के लिए 200 मीटर लंबी लाइन लगानी पड़ी। असली पत्रकार ऐसे आयोजनों में लाइन लगाने से बचते हैं, क्योंकि उनका फोकस जानकारी इकट्ठा करना और रिपोर्टिंग करना होता है, न कि गिफ्ट कलेक्ट करना। लेकिन ये कथित मीडिया कर्मी सिर्फ उपहार के लालच में घंटों इंतजार करते नजर आए। सवाल यह है कि इन लोगों को आमंत्रण कौन भेजता है? आयोजन करने वाले विभागों का तर्क है कि मंत्रियों को ज्यादा से ज्यादा भीड़ दिखानी होती है, इसलिए कोई भी आ जाए, स्वागत है। लेकिन इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर बट्टा लग रहा है।
पत्रकारिता पर कलंक क्यों?
पत्रकारिता एक जिम्मेदार और पवित्र पेशा है, जो समाज का चौथा स्तंभ माना जाता है। इसका काम सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करना, जनता की आवाज उठाना और सच्चाई को सामने लाना है। लेकिन जब कुछ लोग इस पेशे का इस्तेमाल सिर्फ व्यक्तिगत लाभ के लिए करते हैं, तो पूरे मीडिया समुदाय की साख दांव पर लग जाती है। ये वायरल वीडियो न केवल भोपाल या मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे देश में पत्रकारों की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लोग सोशल मीडिया पर मजाक उड़ा रहे हैं कि “भोपाल के पत्रकारों को न्यूज से ज्यादा गिफ्ट की पड़ी है।”
ऐसे आयोजन असली पत्रकारों के लिए भी असुविधाजनक बन जाते हैं। वे शांतिपूर्वक सवाल पूछना चाहते हैं, लेकिन भीड़ और अफरा-तफरी में उनकी आवाज दब जाती है। नतीजा यह होता है कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन चर्चा नहीं हो पाती, और आयोजन का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है।
समाधान की दिशा में कदम
जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों में इस मुद्दे पर चिंता है। वे एक ठोस नीति बनाने की दिशा में सोच रहे हैं, जिसमें केवल मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को ही आमंत्रित किया जाए। प्रेस कार्ड की सत्यापन प्रक्रिया सख्त की जाए, और आयोजनों में उपहार वितरण को सीमित या बंद किया जाए। कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि उपहार की जगह डिजिटल सामग्री या जानकारी पैकेट दिए जाएं, जो पत्रकारों के काम आएं।
सरकार को भी चाहिए कि प्रेस कॉन्फ्रेंस को ज्यादा व्यवस्थित बनाए। आमंत्रण सूची को सीमित रखें, और भीड़ जुटाने के चक्कर में गैर-पत्रकारों को प्रवेश न दें। इससे न केवल आयोजन की गरिमा बचेगी, बल्कि असली मीडिया कर्मियों को बेहतर माहौल मिलेगा।
पत्रकारिता की यह दुर्दशा लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन अब समय आ गया है कि मीडिया संगठन, जनसंपर्क विभाग और सरकार मिलकर इसे रोकें। असली पत्रकारों को प्रोत्साहित करें और फर्जी लोगों पर अंकुश लगाएं। तभी इस पेशे की लज्जा बच सकेगी और समाज में उसका सम्मान बना रहेगा। आखिरकार, पत्रकारिता जनता की सेवा के लिए है, न कि व्यक्तिगत उपहार बटोरने के लिए।
