By: Ravindra Sikarwar
पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर और मिजोरम राज्यों में रहने वाले ब्नेई मेनाशे समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक पल आ गया है। यह समुदाय खुद को प्राचीन इजराइल की दस खोई हुई जनजातियों में से एक – मेनाशे की संतान मानता है। इजराइल सरकार ने नवंबर 2025 में कैबिनेट बैठक में फैसला लिया कि भारत में बचे हुए लगभग 5,800 ब्नेई मेनाशे सदस्यों को चरणबद्ध तरीके से इजराइल लाया जाएगा। इस योजना के तहत 2026 के अंत तक करीब 1,200 लोग इजराइल पहुंचेंगे, जबकि 2030 तक पूरी कम्युनिटी अपनी ‘वादा की हुई भूमि’ में बस जाएगी। इजराइल ने इस प्रोजेक्ट के लिए करोड़ों रुपये की राशि मंजूर की है, जो न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अहम है।
ब्नेई मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से कुकी-जो और मिजो जातीय समूहों से जुड़ा है। ये लोग सदियों से मौखिक परंपराओं के जरिए अपनी यहूदी जड़ों को संजोए हुए हैं। उनका दावा है कि 722 ईसा पूर्व में असिरियन साम्राज्य के हमले के बाद इजराइल की उत्तरी जनजातियों को निर्वासित कर दिया गया था। ये लोग मध्य एशिया, चीन और बर्मा होते हुए पूर्वोत्तर भारत पहुंचे और यहां बस गए। 20वीं सदी में ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से कई लोग ईसाई बने, लेकिन 1950-70 के दशक में कुछ नेताओं को सपने और धार्मिक ग्रंथों से प्रेरणा मिली कि वे यहूदी वंशज हैं। इसके बाद उन्होंने यहूदी रीति-रिवाज अपनाने शुरू किए, जैसे शब्बात मनाना, कोषेर भोजन और यहूदी त्योहार। 2005 में इजराइल के मुख्य रब्बी ने उन्हें आधिकारिक तौर पर ‘खोई हुई जनजाति’ का हिस्सा माना, जिससे उनकी इजराइल प्रवास की राह खुली।
पिछले दो दशकों में करीब 4,000-5,000 ब्नेई मेनाशे इजराइल जा चुके हैं। अब बचे हुए लोगों की वापसी तेज होगी। इजराइल उन्हें मुख्य रूप से गलील क्षेत्र में बसाएगा, जो लेबनान सीमा से सटा है। इस इलाके में अरब आबादी ज्यादा है, इसलिए नए बसने वालों से इजराइल की उत्तरी सुरक्षा मजबूत करने की योजना है। नए आने वालों को हिब्रू भाषा सिखाई जाएगी, नौकरियां और आवास मुहैया कराए जाएंगे। इजराइल पहुंचने पर उन्हें औपचारिक रूप से यहूदी धर्मांतरण प्रक्रिया पूरी करनी होगी, ताकि कोई धार्मिक संदेह न रहे।
मणिपुर में मई 2023 से चली आ रही जातीय हिंसा ने इस प्रवास को और जरूरी बना दिया। मेतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच संघर्ष में सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों विस्थापित हुए। ब्नेई मेनाशे, जो ज्यादातर कुकी समूह से हैं, बुरी तरह प्रभावित हुए। उनके घर जलाए गए, सिनेगॉग क्षतिग्रस्त हुए और कई परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए। इस हिंसा ने समुदाय को सुरक्षा की तलाश में इजराइल की ओर और आकर्षित किया। मिजोरम में हालात अपेक्षाकृत शांत हैं, लेकिन वहां भी लोग अपनी जड़ों की पुकार महसूस करते हैं।
समुदाय के नेता जेरेमिया एल. ह्नामते कहते हैं कि यह सिर्फ हिंसा से भागना नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी जड़ों की ओर लौटना है। वे ‘प्रॉमिस्ड लैंड’ की बात करते हैं और उत्साहित हैं कि अब उनका सपना पूरा होने वाला है। दिसंबर 2025 में इजराइल से रब्बियों की टीम मिजोरम पहुंची, जो योग्य उम्मीदवारों का चयन कर रही है। प्राथमिकता उन परिवारों को दी जा रही है जिनके रिश्तेदार पहले से इजराइल में हैं। फरवरी 2026 तक मिजोरम और मणिपुर से 300-300 लोगों का पहला जत्था रवाना हो सकता है।
भारत में यहूदियों का इतिहास भी रोचक है। प्राचीन काल में कुछ यहूदी समुद्री रास्ते से केरल पहुंचे और कोचीन में बसे। बाद में बगदादी यहूदी मुंबई, कोलकाता आए। लेकिन ब्नेई मेनाशे अलग हैं – वे पूर्वोत्तर के आदिवासी समूहों के साथ घुले-मिले हैं और अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। भारत सरकार इस प्रवास को सकारात्मक देखती है, क्योंकि इससे भारत-इजराइल संबंध और मजबूत होंगे।
यह यात्रा न केवल एक समुदाय की घर वापसी है, बल्कि बाइबिल की भविष्यवाणियों की याद दिलाती है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे ‘जायनिस्ट मिशन’ बताया है। समुदाय के युवा इजराइल में नौकरी, शिक्षा और सुरक्षा की उम्मीद कर रहे हैं। कई तो इजराइली सेना में सेवा देने को तैयार हैं। यह प्रक्रिया पूरी होने पर ब्नेई मेनाशे की 2700 साल पुरानी निर्वासन की कहानी एक खुशी के अंत पर पहुंच जाएगी। आने वाले सालों में पूर्वोत्तर भारत के ये पहाड़ी इलाके अपने इन ‘खोए हुए भाइयों’ को अलविदा कहेंगे, जो अब इजराइल की धरती पर नई जिंदगी शुरू करेंगे।
