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By: Ravindra Sikarwar

MP news: मध्य प्रदेश के इंदौर शहर, जो लगातार आठ बार देश का सबसे स्वच्छ शहर का खिताब जीत चुका है, इन दिनों एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है। भागीरथपुरा इलाके में पेयजल पाइपलाइन में सीवरेज का पानी मिलने से दूषित जल की आपूर्ति हुई, जिसके कारण उल्टी-दस्त जैसी बीमारियां फैलीं। इस घटना में अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग प्रभावित हुए हैं। स्थानीय निवासियों और अधिकारियों के अनुसार मौतों का आंकड़ा अलग-अलग बताया जा रहा है, लेकिन यह त्रासदी शहर की स्वच्छता की चमक को फीका कर रही है।

संकट की शुरुआत दिसंबर के अंतिम सप्ताह में हुई, जब भागीरथपुरा के लोगों ने नलों से बदबूदार और गंदा पानी आने की शिकायत की। जांच में पता चला कि पुलिस चौकी के पास बने सार्वजनिक शौचालय के नीचे मुख्य पेयजल पाइपलाइन में लीकेज था, जिससे सीवरेज का गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया। इससे इलाके में डायरिया और उल्टी-दस्त का प्रकोप फैल गया। प्रभावितों में महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे बच्चे भी शामिल हैं। एक दुखद मामला पांच महीने के मासूम अव्यान साहू का है, जिनकी मां ने दूध गाढ़ा करने के लिए पानी मिलाया था, लेकिन वह पानी जहरीला निकला और बच्चे की जान ले ली। परिजनों का कहना है कि महीनों से गंदे पानी की शिकायतें की जा रही थीं, लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया।

मृतकों की संख्या को लेकर भ्रम की स्थिति है। कुछ रिपोर्ट्स में 7 से 12 तक मौतें बताई जा रही हैं, जबकि स्थानीय लोग और विपक्षी दल इससे अधिक का दावा कर रहे हैं। अस्पतालों में 100 से अधिक मरीज भर्ती हैं, और हजारों लोग किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए हैं। प्रशासन ने दूषित लाइन को बंद कर टैंकरों से पानी की आपूर्ति शुरू की है, साथ ही घर-घर सर्वे कर मेडिकल टीमें तैनात की गई हैं। प्रभावितों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित किया गया है, और निजी अस्पतालों को भी सरकारी खर्च पर उपचार करने के निर्देश दिए गए हैं।

मामले में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्वयं इंदौर पहुंचकर अस्पतालों में भर्ती मरीजों से मुलाकात की। उन्होंने पीड़ितों के स्वास्थ्य का जायजा लिया और डॉक्टरों से इलाज की स्थिति पर चर्चा की। मुख्यमंत्री ने इसे गंभीरता से लेते हुए लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की। तीन अधिकारियों को निलंबित किया गया और एक को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। साथ ही उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई है, जो जल्द रिपोर्ट सौंपेगी। मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये की सहायता राशि का ऐलान भी किया गया है।

हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भी इस मामले में सक्रिय हस्तक्षेप किया। दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम से 2 जनवरी तक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। याचिकाकर्ताओं में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रितेश इंसानी और स्थानीय निवासी राहुल गायकवाड़ शामिल हैं। कोर्ट ने साफ पानी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने, सभी मरीजों का मुफ्त और बेहतर इलाज करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार पर प्रशासनिक लापरवाही का आरोप लगाते हुए जांच समिति गठित की है, जिसमें पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा और अन्य विधायक शामिल हैं। उन्होंने दोषी अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

इसी बीच, शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का एक विवादास्पद बयान भी सुर्खियों में रहा। एमजीएम मेडिकल कॉलेज में बैठक के बाद एक पत्रकार ने पीड़ितों को मुआवजा और पानी की व्यवस्था पर सवाल किया, तो मंत्री नाराज हो गए और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर माफी मांगी, कहते हुए कि दुख की घड़ी में शब्द गलत निकल गए।

यह घटना इंदौर की स्वच्छता की छवि पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। वर्ष 2021 में वाटर प्लस सिटी का दर्जा पाने वाला यह शहर अब पेयजल प्रबंधन की कमियों से जूझ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाइपलाइन रखरखाव और सीवरेज सिस्टम में सुधार की जरूरत है, ताकि ऐसी त्रासदियां दोबारा न हों। प्रशासन अब पूरे शहर में पानी की लाइनों की जांच कर रहा है, और उम्मीद है कि जल्द स्थिति सामान्य हो जाएगी। लेकिन पीड़ित परिवारों का दर्द और खोई हुई जानें इस संकट की गंभीरता को रेखांकित कर रही हैं।

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