By: Ravindra Sikarwar
उत्तर प्रदेश की पवित्र नगरी वाराणसी (काशी) में एक युवा इंजीनियर ने सनातन धर्म अपनाने का फैसला कर सबको चौंका दिया। मध्य प्रदेश के सागर जिले के 33 वर्षीय असद खान ने गंगा घाट पर वैदिक विधि-विधान से हिंदू धर्म में प्रवेश किया और अपना नया नाम अथर्व त्यागी रखा। यह घटना 29 दिसंबर 2025 को हुई, जिसकी खबर प्रमुख मीडिया हाउस जैसे आज तक, रिपब्लिक भारत, जगरण और टीवी9 हिंदी में प्रमुखता से छपी। कई हिंदू संगठनों ने इसे ‘घर वापसी’ की संज्ञा दी है।
अथर्व त्यागी पेशे से सिविल इंजीनियर हैं और बचपन से ही सनातन संस्कृति के प्रति गहरा लगाव रखते थे। उन्होंने बताया कि मंदिरों में जाना और पूजा-पाठ करना उन्हें हमेशा से अच्छा लगता था, लेकिन नाम मुस्लिम होने के कारण कभी-कभी असहजता महसूस होती थी। हाल के वर्षों में बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। 2025 में बांग्लादेश में ईशनिंदा के आरोपों में हिंदुओं पर हमलों की दर्जनों घटनाएं सामने आईं, जिनमें पीट-पीटकर हत्याएं और मंदिरों पर हमले शामिल हैं। इन खबरों ने उनके मन में धर्म, मानवता और आस्था को लेकर गहरे सवाल उठाए।
धीरे-धीरे अथर्व त्यागी का झुकाव भगवद्गीता, उपनिषदों और अन्य हिंदू दर्शन ग्रंथों की ओर बढ़ा। लंबे वैचारिक चिंतन के बाद उन्होंने सनातन धर्म अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक आवाज को सुनकर उठाया गया है। सनातन धर्म के सिद्धांत जैसे अहिंसा, करुणा और सार्वभौमिक मानवता उन्हें बेहद प्रभावित करते हैं। उन्होंने परिवार से भी सहमति ली है, जो अभी इस्लाम का पालन करता है।


गंगा के बीच हुआ धार्मिक अनुष्ठान
वाराणसी के अस्सी घाट या गंगा की लहरों के बीच नाव पर यह पूरा कार्यक्रम आयोजित किया गया। 21 ब्राह्मणों की मौजूदगी में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ शुद्धिकरण प्रक्रिया पूरी की गई। इसमें पंचगव्य स्नान, मुंडन, तिलक लगाना, गणेश पूजा, हनुमान चालीसा पाठ और हवन शामिल थे। नाई ने मुंडन किया, शिखा छोड़ी गई और अंत में नामकरण संस्कार कर उन्हें अथर्व त्यागी नाम दिया गया। कार्यक्रम में काशी के विद्वान पंडों और पुरोहितों ने मार्गदर्शन किया। अथर्व त्यागी ने बाबा विश्वनाथ का अभिषेक किया और शाम को गंगा आरती में भाग लिया।
अथर्व त्यागी ने कहा कि सनातन धर्म अपनाने के बाद उन्हें आत्मिक शांति और मानसिक संतुलन मिल रहा है। वे खुद को महाकाल (उज्जैन) और बजरंग बली के भक्त बताते हैं और जल्द ही महाकाल के दर्शन करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने एक अफिडेविट भी तैयार किया है, जिसमें धर्म परिवर्तन की घोषणा की गई है।
बांग्लादेश हिंसा का संदर्भ
अथर्व त्यागी की यह यात्रा बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ती हिंसा के बीच और भी प्रासंगिक हो जाती है। 2025 में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान ईशनिंदा के आरोपों में हिंदुओं को निशाना बनाए जाने की 71 से अधिक घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्याएं, घरों में आगजनी और मंदिरों पर हमले शामिल हैं। दिसंबर में ही मैमनसिंह में दीपू चंद्र दास नामक हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या कर शव जलाने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ाई। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ऐसे आरोप अक्सर पूरे समुदाय को निशाना बनाते हैं, जिससे अल्पसंख्यक डर के साए में जी रहे हैं।
यह घटना व्यक्तिगत स्तर पर आस्था की खोज को दर्शाती है, लेकिन व्यापक संदर्भ में धार्मिक सहिष्णुता और मानवता की बात करती है। अथर्व त्यागी ने जोर देकर कहा कि उनका उद्देश्य किसी विवाद को जन्म देना नहीं, बल्कि अपने विश्वास के अनुसार जीवन जीना है। काशी जैसे धार्मिक केंद्र में ऐसी घटनाएं सनातन धर्म की समावेशी प्रकृति को भी उजागर करती हैं।
यह कहानी न केवल एक व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा है, बल्कि बदलते समय में आस्था और पहचान के सवालों को भी सामने लाती है। अथर्व त्यागी अब नई शुरुआत के साथ आगे बढ़ रहे हैं, और उनकी यह यात्रा कई लोगों के लिए प्रेरणा बन सकती है।
