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By: Ravindra Sikarwar

बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल एक बार फिर खतरनाक मोड़ ले चुकी है। छात्र नेता शरीफ ओसमान हादी की मौत के बाद शुरू हुए प्रदर्शनों ने पूरे देश को हिंसा की आग में झोंक दिया है। इस अशांति की सबसे दर्दनाक घटना लक्ष्मीपुर जिले में सामने आई, जहां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के एक स्थानीय नेता के घर को उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया। इस हमले में 7 साल की एक मासूम बच्ची की जलकर मौत हो गई, जबकि परिवार के तीन अन्य सदस्य गंभीर रूप से झुलस गए। यह घटना न केवल राजनीतिक बदले की क्रूरता को उजागर करती है, बल्कि आम नागरिकों, खासकर बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। अंतरिम सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बड़ी चुनौती है।

हिंसा की शुरुआत और व्यापक प्रदर्शन
बांग्लादेश में ताजा अशांति की जड़ छात्र नेता शरीफ ओसमान हादी की हत्या है। हादी 2024 के छात्र आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक थे, जिसने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। 12 दिसंबर को मस्जिद से निकलते समय अज्ञात हमलावरों ने उन पर गोली चलाई थी। गंभीर रूप से घायल हादी को सिंगापुर ले जाया गया, जहां 18 दिसंबर को उनकी मौत हो गई।

हादी की मौत की खबर फैलते ही देशभर में प्रदर्शन भड़क उठे। ढाका सहित कई शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने प्रमुख मीडिया हाउसों जैसे द डेली स्टार और प्रथम आलो के दफ्तरों पर हमला किया, तोड़फोड़ की और आग लगा दी। कुछ जगहों पर भारत विरोधी नारे लगे और भारतीय दूतावासों की ओर मार्च की कोशिश की गई। पूर्व सत्तारूढ़ अवामी लीग से जुड़ी संपत्तियों को भी निशाना बनाया गया। इस हिंसा में अल्पसंख्यकों पर हमले की अलग घटनाएं भी सामने आईं, लेकिन मुख्य फोकस राजनीतिक बदले पर रहा।

लक्ष्मीपुर में दिल दहला देने वाली घटना
इस अशांति की सबसे भयानक वारदात 20 दिसंबर की रात लक्ष्मीपुर सदर उपजिला के पश्चिम चार मंसा गांव में हुई। बीएनपी के भबानीगंज यूनियन इकाई के सहायक संगठन सचिव बेलाल हुसैन एक व्यवसायी हैं। उनकी टिन शेड वाली घर में परिवार सो रहा था। रात करीब 1 बजे अज्ञात उपद्रवियों ने घर के दोनों दरवाजे बाहर से ताला लगा दिया, पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी।

आग की लपटें देखकर बेलाल की मां हाजेरा बेगम बाहर निकलीं और चीखने लगीं। बेलाल ने किसी तरह दरवाजा तोड़कर खुद को बाहर निकाला। उनकी पत्नी नजमा चार महीने के शिशु अबीर और 6 साल के बेटे हबीब को लेकर सुरक्षित बाहर आ गईं। लेकिन तीन बेटियां कमरे में फंस गईं। बड़ी बेटियां सलमा अक्तर (16) और सामिया अक्तर (14) को गंभीर जलन के साथ बचाया गया, लेकिन सबसे छोटी 7 साल की आयशा अक्तर आग में फंसकर जल गईं।

फायर सर्विस की टीम ने आग बुझाई और आयशा का शव बरामद किया। बेलाल और उनकी दो बेटियों को पहले लक्ष्मीपुर सदर अस्पताल ले जाया गया। बेटियों की हालत गंभीर होने पर उन्हें ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बर्न यूनिट में शिफ्ट कर दिया गया, जहां डॉक्टरों ने उनकी स्थिति नाजुक बताई। शरीर के 50-60 प्रतिशत हिस्से झुलस चुके हैं।

जांच और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। लक्ष्मीपुर सदर मॉडल थाने के ओसी मोहम्मद वाहिद परवेज ने पुष्टि की कि यह आगजनी का सुनियोजित हमला लगता है। हमलावरों की पहचान और मकसद का पता लगाया जा रहा है। जिला बीएनपी के संयुक्त संयोजक हसिबुर रहमान ने घटना की कड़ी निंदा की और दोषियों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग की।

बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने इसे राजनीतिक विरोधियों को दबाने की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि देश में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और ऐसी घटनाएं लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने हिंसा पर चिंता जताई है और सुरक्षा बलों को अलर्ट पर रखा गया है।

समाज पर गहरा असर और आगे की चुनौतियां
यह घटना बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता की गंभीरता को दिखाती है। एक मासूम बच्ची की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है। फरवरी 2026 में होने वाले चुनाव से पहले ऐसी हिंसा स्थिरता को खतरे में डाल रही है। बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान की 25 दिसंबर को स्वदेश वापसी भी इस माहौल में महत्वपूर्ण हो गई है।

समाज को ऐसी क्रूरता से बचाने के लिए सभी दलों को संयम बरतना होगा। कानून-व्यवस्था बहाल करना और निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। आयशा की मौत एक सबक है कि राजनीतिक द्वेष कितना घातक हो सकता है। उम्मीद है कि जांच से सच सामने आएगा और दोषी सजा पाएंगे, ताकि ऐसी त्रासदी दोबारा न हो।

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