By: Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के हरदा जिले में 21 दिसंबर 2025 को करणी सेना परिवार द्वारा आयोजित जनक्रांति न्याय आंदोलन ने पूरे क्षेत्र को गूंजा दिया। नेहरू स्टेडियम में शांतिपूर्ण तरीके से चले इस कार्यक्रम में करीब 20 हजार से अधिक कार्यकर्ता और समर्थक जुटे, जिसे जिले के इतिहास का सबसे बड़ा प्रदर्शन माना जा रहा है। यह आंदोलन मुख्य रूप से जुलाई 2025 में राजपूत समाज और करणी सेना के सदस्यों पर हुए कथित पुलिस लाठीचार्ज के विरोध में शुरू हुआ था, लेकिन अब यह 21 सूत्रीय मांगों का व्यापक प्लेटफॉर्म बन चुका है। इन मांगों में न्यायिक जांच, दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई के साथ-साथ आर्थिक आधार पर आरक्षण, ईडब्ल्यूएस कोटे में सुधार, किसान हित, महिला सुरक्षा, गो-संरक्षण और पूर्व सैनिकों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
आंदोलन की जड़ें जुलाई महीने की उस घटना में छिपी हैं, जब हरदा में एक राजपूत युवक को एक व्यापारी द्वारा हीरे के सौदे में कथित तौर पर धोखा दिया गया। युवक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई न होने पर करणी सेना ने सक्रिय भूमिका निभाई। संगठन ने थाने का घेराव किया, जिस दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया। इस घटना में करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीवन सिंह शेरपुर सहित कई कार्यकर्ता घायल हुए और कुछ को हिरासत में लिया गया। शेरपुर को एक दिन के लिए जेल भी भेजा गया था। इस अन्याय के खिलाफ करणी सेना ने पिछले तीन महीनों से व्यापक तैयारी की और गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया। नतीजतन, प्रदेश के विभिन्न जिलों से हजारों लोग हरदा पहुंचे और स्टेडियम में जनसैलाब उमड़ पड़ा।
प्रशासन की ओर से किसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए व्यापक इंतजाम किए गए थे। हरदा शहर पूरी तरह छावनी में तब्दील हो गया था। दस से अधिक जिलों से पुलिस बल मंगाया गया, एसएएफ, क्यूआरएफ और एसटीएफ की टीमें तैनात की गईं। लगभग 1500 अतिरिक्त पुलिसकर्मी रिजर्व में रखे गए। आंदोलन स्थल पर पांच लेयर की सुरक्षा व्यवस्था थी, जबकि सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन की मदद से निरंतर निगरानी की जा रही थी। जिले की सीमाओं पर बैरिकेडिंग लगाई गई और शहर के मुख्य मार्गों पर ट्रैफिक डायवर्ट किया गया। उदाहरण के लिए, छीपानेर जाने वाले वाहन अस्पताल तिराहा, नई सब्जी मंडी या बायपास चौराहे से वैकल्पिक रास्ते अपनाने को कहा गया। इसी तरह खंडवा से इंदौर या नर्मदापुरम-बैतूल जाने वाले वाहन खेड़ीपुरा चौराहा और फोरलेन बायपास का उपयोग कर रहे थे। जिला कलेक्टर सिद्धार्थ जैन ने 24 अधिकारियों और 48 पटवारियों की टीम गठित की, जो विभिन्न स्थानों पर नजर रख रही थी।
आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा और करीब 11 घंटे तक चला। मंच से करणी सेना के नेताओं ने अपनी मांगें जोर-शोर से उठाईं। जीवन सिंह शेरपुर ने अनशन कर प्रदर्शन की तीव्रता दिखाई और बाद में जूस पीकर इसे समाप्त किया। उन्होंने कहा कि उनकी एकता के आगे सरकार को झुकना पड़ा और न्याय की जीत हुई। आंदोलन के अंत में मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया। प्रशासन ने कुछ दोषी अधिकारियों को मुख्यालय अटैच करने, निलंबन और न्यायिक जांच समिति गठित करने का आश्वासन दिया। करणी सेना ने इसे अपनी आंशिक सफलता माना, लेकिन चेतावनी दी कि यदि सभी मांगें पूरी नहीं हुईं तो भोपाल और दिल्ली में बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
इस आंदोलन में सर्व समाज का समर्थन मिला, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की मांगों को लेकर। लोगों ने नारे लगाए कि ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र की प्रक्रिया सरल की जाए, आयु सीमा में छूट दी जाए और अतिरिक्त अवसर प्रदान किए जाएं। करणी सेना ने राजनीतिक दल बनाने और चुनाव लड़ने का भी ऐलान किया, ताकि जनता की आवाज विधानसभा और संसद तक पहुंचाई जा सके।
यह आंदोलन न केवल स्थानीय अन्याय के खिलाफ था, बल्कि व्यापक सामाजिक मुद्दों को उठाने का माध्यम बना। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद कोई हिंसक घटना नहीं हुई, जो संगठन की शांतिपूर्ण प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हरदा की यह घटना मध्य प्रदेश की राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गई है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि सरकार इन मांगों पर कितनी गंभीरता दिखाती है।
