By: Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र, जो लंबे समय से अफीम उत्पादन के लिए जाना जाता है, अब सिंथेटिक नशीले पदार्थों की तस्करी का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। पहले एमडी (मेफेड्रोन) जैसे ड्रग्स की सप्लाई मुख्य रूप से इंदौर से मुंबई की ओर होती थी, लेकिन अब तस्करों ने अपना रूट बदल लिया है और गुजरात को नया ठिकाना बना लिया है। यह बदलाव तस्करों की रणनीति को दर्शाता है, जो कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सख्ती से बचने के लिए नए रास्ते अपनाते हैं। हाल ही में केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो ने एक बड़ी सफलता हासिल की है, जिसमें 12 किलोग्राम से अधिक एमडी ड्रग जब्त की गई, जिसकी बाजार कीमत करीब 12 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
यह कार्रवाई 16 दिसंबर 2025 की रात को इंदौर के निकट महू-नसीराबाद फोरलेन हाइवे पर डोडर टोल प्लाजा के पास की गई। नारकोटिक्स ब्यूरो की मध्य प्रदेश इकाई को गुप्त सूचना मिली थी कि रतलाम-मंदसौर क्षेत्र से एक वाहन गुजरात की दिशा में बड़े पैमाने पर मादक पदार्थ ले जा रहा है। इस जानकारी पर टीम ने नाकाबंदी की और एक संदिग्ध कार को रोका। कार राजस्थान नंबर की थी और चित्तौड़गढ़ से पासिंग थी। तलाशी के दौरान कार से 10 पैकेट बरामद हुए, जिनमें कुल 12 किलोग्राम 55 ग्राम एमडी ड्रग भरा था। आरोपी ड्राइवर को मौके से गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि कार और ड्रग्स को जब्त कर लिया गया।

एमडी एक सिंथेटिक ड्रग है, जो पार्टी कल्चर और युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यह अफीम या हेरोइन से अलग होता है और प्रयोगशालाओं में रासायनिक प्रक्रिया से बनाया जाता है। मालवा-नीमच क्षेत्र में अवैध लैब्स में इसे सस्ते में तैयार किया जाता है – लगभग 15-16 लाख रुपये प्रति किलोग्राम की लागत पर। लेकिन बड़े शहरों और गुजरात जैसे बाजारों में इसकी कीमत 1 करोड़ रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है। यही भारी मुनाफा तस्करों को आकर्षित करता है। पहले यह ड्रग मुख्य रूप से मुंबई की रेव पार्टियों तक पहुंचाई जाती थी, लेकिन अब गुजरात के बढ़ते बाजार और नए रूट्स के कारण तस्करी की दिशा बदल गई है।
हाल के महीनों में मध्य प्रदेश में एमडी से जुड़ी कई बड़ी कार्रवाइयां हुई हैं। कुछ समय पहले रतलाम जिले में एक बड़ी अवैध फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया गया था, जहां एमडी का उत्पादन हो रहा था। इसी तरह मंदसौर में भी बड़ी मात्रा में ड्रग्स पकड़ी गई। ये घटनाएं बताती हैं कि मालवा क्षेत्र अब केवल प्राकृतिक अफीम का केंद्र नहीं रह गया, बल्कि सिंथेटिक ड्रग्स का हब बनता जा रहा है। राजस्थान के निकटवर्ती इलाकों से भी कच्चा माल आता है, जिससे नेटवर्क और मजबूत हो रहा है।
नारकोटिक्स ब्यूरो की इन लगातार सफलताओं ने स्थानीय पुलिस की खुफिया व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। कई मामलों में पुलिस को तस्करी की भनक तक नहीं लगी, जबकि केंद्रीय एजेंसी ने अकेले बड़ी कार्रवाइयां की। विशेषज्ञों का मानना है कि तस्कर अब अधिक संगठित हो गए हैं और वे पुलिस की निगरानी से बचने के लिए नए तरीके अपनाते हैं। गुजरात रूट का इस्तेमाल इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, क्योंकि वहां से आगे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच आसान है।
यह कार्रवाई नशीले पदार्थों के खिलाफ चल रही मुहिम का हिस्सा है। सरकार और एजेंसियां सिंथेटिक ड्रग्स पर विशेष नजर रख रही हैं, क्योंकि ये युवा पीढ़ी को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं। एमडी जैसी ड्रग्स न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं, बल्कि इनसे जुड़ा अपराध भी बढ़ रहा है। नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारियों ने कहा कि ऐसी कार्रवाइयां जारी रहेंगी और तस्करों के नेटवर्क को पूरी तरह तोड़ा जाएगा।
समाज को भी जागरूक होने की जरूरत है। युवाओं में ड्रग्स के प्रति आकर्षण को रोकने के लिए अभियान चलाने चाहिए। मालवा जैसे क्षेत्रों में आर्थिक विकल्प प्रदान कर अवैध गतिविधियों को रोका जा सकता है। यह घटना एक चेतावनी है कि ड्रग तस्करी का खतरा लगातार बढ़ रहा है और इसे रोकने के लिए सभी स्तरों पर सहयोग जरूरी है। उम्मीद है कि ऐसी सख्त कार्रवाइयों से तस्करों पर लगाम लगेगी और क्षेत्र ड्रग-मुक्त हो सकेगा।
