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By: Ravindra Sikarwar

जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में आकर थरथरा रही थी, तब भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ने एक मजबूत सहारे का काम किया। यह बात मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोपाल के लाल परेड मैदान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वन मेले के उद्घाटन समारोह में कही। इस कार्यक्रम में उन्होंने आयुर्वेद को न केवल एक इलाज प्रणाली बल्कि एक संपूर्ण जीवनशैली बताया, जो मानव शरीर को नया जीवन प्रदान करने में सक्षम है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कोविड के दौर में जब वैश्विक स्तर पर हलचल मची हुई थी, तब आयुर्वेदिक काढ़े ने ऐसा चमत्कार दिखाया कि लोगों की उम्मीदें कई गुना बढ़ गईं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आयुर्वेद की जड़ें हमारी सांस्कृतिक विरासत में गहरी हैं और यह प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है, जो हमें स्वस्थ और दीर्घायु जीवन प्रदान करता है।

इस समारोह में मुख्यमंत्री ने भारतीय जीवन दर्शन के चार आश्रमों—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे जंगलों और प्रकृति से मानव का गहरा जुड़ाव रहा है। उन्होंने ऋषि-मुनियों की परंपरा का उल्लेख किया, जो जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों के माध्यम से स्वास्थ्य का रहस्य जानते थे। डॉ. यादव ने कहा कि जंगलों में छिपी ये जड़ी-बूटियां न केवल रोगों का इलाज करती हैं बल्कि शरीर को कायाकल्प की दिशा में ले जाती हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हमारी दैनिक आहार सामग्री में शामिल प्राकृतिक तत्व, जैसे हल्दी, अदरक, तुलसी आदि, उम्र बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुख्यमंत्री ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सराहना की लेकिन जोर दिया कि जड़ी-बूटियों की ताकत का कोई मुकाबला नहीं है। उन्होंने कहा कि जब दुनिया भर में वैक्सीन और दवाओं की खोज चल रही थी, तब आयुर्वेद ने घरेलू उपचारों के जरिए लाखों लोगों को राहत प्रदान की। काढ़े का जिक्र करते हुए उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि इसने ऐसा प्रभाव दिखाया कि लोगों की उम्मीदें आसमान छूने लगीं।

यह कार्यक्रम मध्य प्रदेश के वन विभाग द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें वन राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार, विधायक भगवानदास सबनानी, नगर निगम अध्यक्ष, वनबल प्रमुख बी.आर. अंबाड़े, लघु वनोपज संघ की प्रबंध संचालक समिता राजौरा और प्रफुल्ल फुलझले जैसे प्रमुख व्यक्ति उपस्थित थे। इन सभी ने आयुर्वेद और वनों की महत्वपूर्णता पर अपने विचार साझा किए। वन राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने बताया कि जल्द ही उज्जैन में भी एक ऐसा ही वन मेला आयोजित किया जाएगा, जो लोगों को आयुर्वेदिक ज्ञान और जड़ी-बूटियों से जोड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस मेले में 200 से अधिक आयुर्वेदिक चिकित्सक और विशेषज्ञ निःशुल्क परामर्श देंगे, जिससे आम जनता को लाभ मिलेगा।

समिता राजौरा ने विश्वास व्यक्त किया कि यह 11वां अंतर्राष्ट्रीय वन मेला लोगों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा उतरेगा। उन्होंने मेले की विशेषताओं पर प्रकाश डाला और कहा कि यहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी भरपूर आयोजन होगा। इनमें ऑर्केस्ट्रा, नुक्कड़ नाटक, लोक नृत्य, स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता, फैंसी ड्रेस और गायन प्रतियोगिताएं शामिल हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपनी बात में कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं भी कीं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने पिछले एक साल में 8 वेलनेस सेंटर खोले हैं, जो आयुर्वेदिक उपचार और जीवनशैली पर आधारित हैं। इन सेंटरों में लोग योग, ध्यान और जड़ी-बूटियों के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ ले सकते हैं। इसके अलावा, लघु वनोपज संघ के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 25 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, जिससे वनवासियों और जड़ी-बूटी संग्राहकों की आय में सुधार होगा।

मुख्यमंत्री ने वन्यजीव संरक्षण पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि 2026 में नौरादेही में रानी दुर्गावती के नाम से एक नया अभयारण्य स्थापित किया जाएगा, जो जैव विविधता को बढ़ावा देगा। साथ ही, सागर जिले में भीमराव अंबेडकर अभयारण्य खोला जाएगा, जहां स्थानीय वनस्पतियों और जीवों का संरक्षण किया जाएगा। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि कोबरा सांपों के बाद अब जिराफ लाने पर भी विचार चल रहा है, जो राज्य के चिड़ियाघरों को और आकर्षक बनाएगा। ये घोषणाएं मध्य प्रदेश को पर्यावरण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अग्रणी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

यह वन मेला ‘समृद्ध वन, खुशहाल वन’ की थीम पर आधारित है और 23 दिसंबर तक चलेगा। मेले में कुल 350 स्टॉल लगाए गए हैं, जिनमें 24 राज्यों की जड़ी-बूटियां प्रदर्शित की जा रही हैं। इनमें 10 शासकीय स्टॉल, 24 अन्य राज्यों के स्टॉल, 16 प्रदर्शनी स्टॉल, 136 निजी स्टॉल और फूड स्टॉल शामिल हैं। यहां मध्य प्रदेश के जिला यूनियन, वन विभाग, वनधन केंद्र, जड़ी-बूटी संग्राहक, उत्पादक, आयुर्वेदिक दवा निर्माता, पारंपरिक भोजन सामग्री के निर्माता और विक्रेता अपने उत्पादों को बेचेंगे और प्रदर्शित करेंगे। लोग यहां दाल-पानिया, गोंडी जैसी पारंपरिक डिशेज का स्वाद ले सकेंगे, जो स्थानीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अलावा, 50 ओपीडी स्टॉल होंगे जहां चिकित्सीय सलाह ली जा सकेगी, और एक किड्स जोन भी बनाया गया है जहां बच्चे खेल-कूद और सीखने की गतिविधियों में भाग ले सकेंगे।

मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला भी आकर्षण का केंद्र होगी।

  • 17 दिसंबर की शाम को डिंडौरी के पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति होगी, जो आदिवासी संस्कृति को जीवंत करेगी।
  • 18 दिसंबर को ऑर्केस्ट्रा में अंचल शर्मा ग्रुप का प्रदर्शन होगा, जो संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध करेगा।
  • 19 दिसंबर की शाम विरासत सूफी की म्यूजिकल प्रस्तुति होगी, जिसमें आध्यात्मिक संगीत की धुनें गूंजेंगी।
  • 20 दिसंबर को ‘एक शाम वन विभाग के नाम’ कार्यक्रम में सरगम म्यूजिकल ग्रुप द्वारा फॉरेस्ट मेलोडी प्रस्तुत की जाएगी, जो वनों की सुंदरता को संगीत के माध्यम से दर्शाएगी।
  • 21 दिसंबर की शाम ख्याति प्राप्त गायक नीरज श्रीधर (बॉम्बे वाइकिंग्स) का लाइव शो होगा, जो युवाओं को विशेष रूप से आकर्षित करेगा।
  • 22 दिसंबर को मानसरोवर द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे
  • 23 दिसंबर को अंतिम दिन झाबुआ का पारंपरिक नृत्य मेले का समापन करेगा।

इसके अलावा, मेले में अंतर्राष्ट्रीय कार्यशालाओं का आयोजन भी किया जाएगा। वन राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने बताया कि 19 और 20 दिसंबर को ये कार्यशालाएं होंगी, जिसमें भारत के 17 प्रतिनिधि, नेपाल के 2 और भूटान के 1 प्रतिनिधि भाग लेंगे। ये कार्यशालाएं भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (आईआईएफएम) के सहयोग से आयोजित की जा रही हैं, जहां जड़ी-बूटियों के संरक्षण, उपयोग और वैश्विक व्यापार पर चर्चा होगी। ये सत्र विशेषज्ञों को एक मंच प्रदान करेंगे जहां वे अनुभव साझा कर सकेंगे और नई तकनीकों पर विचार-विमर्श करेंगे।

यह मेला न केवल व्यापार और प्रदर्शन का माध्यम है बल्कि पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने का भी एक बड़ा अवसर है। मध्य प्रदेश जैसे राज्य में, जहां वन क्षेत्र व्यापक है, ऐसे आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं। जड़ी-बूटी संग्राहकों को उचित मूल्य मिलने से उनकी आजीविका सुधरती है, और पर्यटक यहां आकर प्रकृति की समृद्धि का अनुभव करते हैं। मुख्यमंत्री की घोषणाएं, जैसे नए अभयारण्यों की स्थापना, राज्य को वन्यजीव पर्यटन के मानचित्र पर मजबूत बनाएंगी। आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब दुनिया भर में प्राकृतिक चिकित्सा की मांग बढ़ रही है। कोविड ने हमें सिखाया कि आधुनिक विज्ञान के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान भी जरूरी है।

इस मेले के माध्यम से लोग न केवल खरीदारी कर सकेंगे बल्कि स्वास्थ्य, संस्कृति और पर्यावरण के बारे में सीखेंगे। यह आयोजन मध्य प्रदेश की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है कि वे वनों को समृद्ध रखते हुए लोगों को खुशहाल जीवन प्रदान करने के लिए प्रयासरत हैं। यदि आप भोपाल में हैं, तो इस मेले में जरूर जाएं और आयुर्वेद की जादुई दुनिया का अनुभव करें। यह न केवल एक मेला है बल्कि प्रकृति और स्वास्थ्य का उत्सव है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है।

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