By: Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: संसद के शीतकालीन सत्र में मंगलवार को केंद्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार गारंटी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विधेयक पेश किया। केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा में ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, 2025’ (संक्षिप्त में VB-G RAM G या वीबी-जी राम जी बिल) प्रस्तुत किया। यह विधेयक मौजूदा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह लेगा। बिल पेश होते ही सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया। विपक्षी दलों ने इसे महात्मा गांधी की विरासत पर हमला करार देते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।
सरकार का दावा है कि नया कानून ग्रामीण भारत को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। इसमें ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को सालाना 125 दिनों का अकुशल श्रम आधारित रोजगार उपलब्ध कराने की गारंटी दी गई है, जो मौजूदा मनरेगा के 100 दिनों से 25 दिन अधिक है। इसके अलावा, विधेयक में जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना विकास, आजीविका संवर्धन और जलवायु अनुकूलन जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया गया है। निर्मित संपत्तियों को एक राष्ट्रीय डिजिटल स्टैक में दर्ज करने का प्रावधान भी शामिल है। सरकार ने बजट में 1.51 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान करने की बात कही और दावा किया कि यह ‘विकसित भारत 2047’ के विजन से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।
शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि महात्मा गांधी जी की भावनाएं उनके दिल में बसती हैं और मौजूदा सरकार ने मनरेगा पर पिछली यूपीए सरकार से चार गुना अधिक खर्च किया है। उन्होंने पूछा कि क्या कांग्रेस ने जवाहर रोजगार योजना का नाम बदलकर मनरेगा किया तो क्या नेहरू जी का अपमान हुआ था? मंत्री ने यह भी कहा कि नया बिल गांधी जी के रामराज्य के आदर्शों और सामाजिक-आर्थिक न्याय की अवधारणा से पूरी तरह मेल खाता है। भाजपा सांसदों ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें योजना के उद्देश्य से नहीं, बल्कि नाम में ‘राम’ शब्द से परेशानी है।
हालांकि, विपक्ष ने बिल को ग्रामीण मजदूरों के अधिकारों पर हमला बताया। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे गरीबों और ग्रामीणों के खिलाफ करार दिया। उन्होंने कहा कि हर योजना का नाम बदलने की यह प्रवृत्ति किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से प्रेरित लगती है। मनरेगा पिछले दो दशकों से करोड़ों ग्रामीण परिवारों को सुरक्षा प्रदान करता आया है, लेकिन नए बिल में केंद्र का योगदान घटाकर राज्यों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। मजदूरी बढ़ोतरी का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है और बिल को स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए।
कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर ने बिल की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि महात्मा गांधी का नाम हटाना ऐतिहासिक गलती है। गांधी जी का रामराज्य सामाजिक-आर्थिक न्याय का प्रतीक था, न कि कोई राजनीतिक एजेंडा। उन्होंने सदन में पुरानी बॉलीवुड फिल्म की पंक्ति उद्धृत करते हुए कहा, “देखो ओ दीवानो, यह काम न करो, राम का नाम बदनाम न करो।” थरूर का कहना था कि गांधी जी का नाम हटाकर बिल अपनी नैतिक दिशा खो रहा है और यह ग्रामीण कार्यक्रम की मूल भावना पर चोट है।
समाजवादी पार्टी के सांसदों ने भी बिल का विरोध किया। धर्मेंद्र यादव ने कहा कि यह राज्यों पर बोझ बढ़ाएगा और मजदूरों की सुरक्षा कमजोर करेगा। कोई भी व्यक्ति गांधी जी का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा, क्योंकि वे अंतिम सांस तक ‘हे राम’ कहते रहे। सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने 200 दिनों के रोजगार और मजदूरी वृद्धि की मांग दोहराई तथा बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की अपील की।
विपक्ष के जोरदार विरोध और नारेबाजी के बीच लोकसभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित करनी पड़ी। विपक्षी सदस्यों ने बिल वापस लेने या संसदीय समिति को भेजने की मांग पर अड़े रहने की बात कही, जबकि सरकार ने कहा कि चर्चा के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी।
यह विधेयक ग्रामीण भारत की बदलती जरूरतों को देखते हुए तैयार किया गया है, लेकिन नाम बदलाव और फंडिंग पैटर्न में बदलाव को लेकर विवाद गहरा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बिल पास होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार ढांचे में बड़ा परिवर्तन लाएगा। हालांकि, विपक्ष इसे अधिकार-आधारित गारंटी को कमजोर करने वाला कदम बता रहा है। आने वाले दिनों में सदन में इस पर और तीखी बहस होने की संभावना है।
