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By: Ravindra Sikarwar

ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने देश के विभिन्न हिस्सों में मिट्टी के स्वास्थ्य पर एक व्यापक अध्ययन किया है। इस शोध में देश के करीब 620 जिलों की मिट्टी के नमूनों का विश्लेषण किया गया और नतीजे बेहद चिंताजनक सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में भारतीय मिट्टी में जैविक कार्बन (ऑर्गेनिक कार्बन) की मात्रा में भारी गिरावट आई है, जो मिट्टी की उर्वरता और फसल उत्पादन के लिए गंभीर खतरा बन रहा है।

विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक कार्बन मिट्टी का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जो उसे जीवंत बनाए रखता है। यह पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने, पानी सोखने की क्षमता बढ़ाने और मिट्टी की संरचना को मजबूत करने का काम करता है। लेकिन रासायनिक खादों का अंधाधुंध उपयोग, फसल अवशेषों को जलाना, एक ही फसल की बार-बार बुवाई और जंगलों की कटाई जैसी गलत कृषि पद्धतियों के कारण यह जैविक कार्बन तेजी से खत्म हो रहा है।

शोध में पाया गया कि देश के अधिकांश जिलों में मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर 0.5 प्रतिशत से भी नीचे चला गया है, जबकि स्वस्थ मिट्टी के लिए यह कम से कम 1 से 2 प्रतिशत होना चाहिए। कुछ क्षेत्रों में तो यह स्तर 0.2 प्रतिशत तक गिर चुका है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के हिस्सों में यह गिरावट सबसे ज्यादा देखी गई है। इन क्षेत्रों में गहन खेती और पानी की अधिकता के कारण भी मिट्टी का जैविक पदार्थ तेजी से नष्ट हो रहा है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाले 20-25 सालों में देश के बड़े हिस्से की मिट्टी पूरी तरह बंजर हो सकती है। पहले जहां एक हेक्टेयर में 50-60 क्विंटल गेहूं या धान आसानी से हो जाता था, अब उसी खेत में 30-40 क्विंटल उत्पादन के लिए भी भारी मात्रा में रासायनिक खाद डालनी पड़ रही है। इससे न सिर्फ किसानों की लागत बढ़ रही है, बल्कि जमीन की प्राकृतिक क्षमता भी लगातार कम हो रही है।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जैविक कार्बन की कमी से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की संख्या घटी है, जो पोषक तत्वों को पौधों तक पहुंचाने का काम करते हैं। नतीजतन, पौधे कमजोर हो रहे हैं और कीट-पतंगों का हमला बढ़ रहा है। इसके अलावा मिट्टी की जल धारण क्षमता भी कम हो रही है, जिससे सूखे और बाढ़ दोनों की स्थिति में फसल को नुकसान ज्यादा हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान प्राकृतिक और संतुलित खेती में ही है। गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, फसल चक्र और अवशेष प्रबंधन जैसी पुरानी पद्धतियों को फिर से अपनाना होगा। साथ ही किसानों को रासायनिक खादों का सीमित और वैज्ञानिक उपयोग करने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। विश्वविद्यालय ने सरकार से मांग की है कि मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड योजना को और प्रभावी बनाया जाए और हर जिले में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ाई जाए।

यह अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की 60 प्रतिशत से ज्यादा आबादी खेती पर निर्भर है। अगर मिट्टी की सेहत नहीं सुधरी तो खाद्य सुरक्षा पर गंभीर संकट आ सकता है। वैज्ञानिकों ने आम लोगों और किसानों से अपील की है कि वे अपनी मिट्टी को बचाने के लिए जैविक खेती की ओर बढ़ें और आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ जमीन छोड़कर जाएं।

यह शोध एक बार फिर याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का खामियाजा अंत में इंसान को ही भुगतना पड़ता है। अब वक्त है कि हम अपनी मिट्टी को फिर से हरा-भरा और जीवंत बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं।