Spread the love

By: Ravindra Sikarwar

छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति रंग ला रही है। बुधवार को एक दिन के भीतर ही दो राज्यों में कुल 15 खूंखार इनामी माओवादियों ने हथियार डालकर आत्मसमर्पण कर दिया। इन सभी पर मिलाकर लगभग 1 करोड़ 12 लाख रुपये का इनाम घोषित था। सबसे बड़ी बात यह है कि सरेंडर करने वालों में महाराष्ट्र का कुख्यात माओवादी कमांडर विनोद सैयाना भी शामिल है, जिसके सिर पर 25 लाख रुपये का इनाम था।

गढ़चिरौली में 89 लाख के 11 माओवादियों का सरेंडर
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में पखांजूर क्षेत्र से सटे जंगल में छिपे 11 माओवादियों ने महाराष्ट्र पुलिस की डीजी रश्मि शुक्ला के सामने औपचारिक रूप से हथियार रख दिए। इनमें कई वरिष्ठ सदस्य थे जो दशकों से सक्रिय थे। विनोद सैयाना लंबे समय से गढ़चिरौली-छत्तीसगढ़ सीमा पर माओवादी गतिविधियों का मुख्य चेहरा था। उसके नेतृत्व में कई पुलिस जवानों पर हमले, आईईडी विस्फोट और आम नागरिकों की हत्याएँ हुई थीं। इन 11 लोगों पर कुल 89 लाख रुपये का इनाम था।

कांकेर में 23 लाख के चार नक्सलियों ने छोड़ा हिंसा का रास्ता
इसी दिन छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में भी चार बड़े इनामी नक्सलियों ने एसपी आई.के. एलेसेला और बीएसएफ के जवानों के सामने सरेंडर किया। इनमें दो महिलाएँ और दो पुरुष शामिल हैं। इन चारों पर कुल 23 लाख रुपये का इनाम था। इनमें से एक महिला नक्सली पर मदनवाड़ा पुलिस हमले में तत्कालीन एसपी की शहादत से जुड़ा आरोप भी था।

छत्तीसगढ़ सरकार का बड़ा फैसला: दर्ज मामले होंगे वापस
आत्मसमर्पण करने वालों के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने राहत भरा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में फैसला लिया गया कि सरेंडर करने वाले नक्सलियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले वापस लेने की प्रक्रिया को तेज किया जाएगा। इसके लिए एक उच्चस्तरीय उप-समिति गठित की गई है जो हर केस की अलग-अलग समीक्षा करेगी।

राज्य की पुनर्वास नीति के तहत सरेंडर करने वाले नक्सलियों को एकमुश्त आर्थिक सहायता, आवास, नौकरी या स्वरोजगार के लिए ऋण और सुरक्षा मुहैया कराई जाती है। साथ ही उनके अच्छे आचरण और नक्सल उन्मूलन में दिए गए सहयोग को देखते हुए उनके पुराने मामले निरस्त करने का प्रावधान है। अधिकारियों का कहना है कि इस नीति की वजह से ही बड़ी संख्या में नक्सली मुख्यधारा में लौट रहे हैं।

सुरक्षा बलों का दबाव और जनता का साथ, दोनों बना रहे घातक
पिछले दो सालों में छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड में सुरक्षा बलों ने जिस तरह लगातार बड़े ऑपरेशन चलाए हैं, उससे माओवादी संगठन की रीढ़ टूट चुकी है। उनके हथियार, गोला-बारूद और रसद की सप्लाई लगभग बंद हो चुकी है। गाँव के लोग अब खुलकर पुलिस का साथ दे रहे हैं और मुखबिरी कर रहे हैं। इसके अलावा ड्रोन, हेलीकॉप्टर और स्पेशल फोर्स की तैनाती से माओवादियों के लिए जंगल में छिपना भी मुश्किल हो गया है।

जो नक्सली कभी गाँव वालों को डराकर खाना और पैसा वसूलते थे, आज वे खुद भूखे-प्यासे भटक रहे हैं। महिला कैडर और नए भर्ती हुए युवा अब कैंप छोड़कर भाग रहे हैं। यही कारण है कि 2024-25 में अब तक सैकड़ों नक्सलियों ने सरेंडर किया है और कई बड़े कमांडर मारे जा चुके हैं।

2026 तक नक्सलमुक्त भारत का सपना अब हकीकत के करीब
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की संयुक्त मुहिम ने नक्सलवाद को उसके अंतिम चरण में पहुँचा दिया है। गृह मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक प्रभावित जिलों की संख्या तेजी से घटी है और हिंसक वारदातें पिछले दशक के सबसे निचले स्तर पर हैं।

गढ़चिरौली और कांकेर में एक ही दिन में 15 इनामी नक्सलियों का आत्मसमर्पण इस बात का जीता-जागता सबूत है कि माओवादी विचारधारा और बंदूक की राजनीति अब दम तोड़ रही है। बस्तर के जंगल अब बंदूक की गूँज से नहीं, विकास की गूँज से गूंजने लगे हैं। आने वाले कुछ महीनों में और बड़े नाम सामने आने की संभावना है।

यह सरेंडर सिर्फ 15 हथियारों का नहीं, बल्कि लाल आतंक के अंत की एक और मजबूत ईंट है।

You missed