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By: Ravindra Sikarwar

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के कांकेर जिले में सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। बुधवार को चार खूंखार नक्सलियों ने हथियार डालकर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। इन चारों पर कुल 23 लाख रुपये का इनाम घोषित था। सबसे बड़ी बात यह है कि सरेंडर करने वालों में वह कुख्यात महिला नक्सली मंजुला उर्फ लक्ष्मी पोटाई भी शामिल है, जिसने वर्षों पहले कांकेर के तत्कालीन एसपी रविंद्र चौबे की शहादत में अहम भूमिका निभाई थी।

कांकेर के पुलिस अधीक्षक आई. कल्याण एलिसेला और बीएसएफ के जवानों की मौजूदगी में इन नक्सलियों ने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण किया। इनमें दो महिलाएँ और दो पुरुष हैं। सरेंडर करने वालों में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की कंपनी नंबर-10 का सदस्य भी शामिल है। मंजुला पर सबसे ज्यादा 8 लाख रुपये का इनाम था, जबकि बाकी तीन पर 5-5 लाख रुपये का इनाम घोषित था।

मदनवाड़ा हमले की आरोपी मंजुला ने डाले हथियार
मंजुला का नाम कांकेर और आसपास के इलाकों में सुनते ही लोग सहम जाते थे। वह वर्ष 2010 में हुए मदनवाड़ा नक्सली हमले की मुख्य आरोपी थी, जिसमें उस समय के एसपी रविंद्र चौबे समेत कई पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। लंबे समय तक जंगलों में छिपी रही मंजुला अब थक चुकी थी। उसने बताया कि लगातार दबाव, आपूर्ति की कमी और सुरक्षा बलों के लगातार ऑपरेशन के कारण अब जंगल में रहना मुश्किल हो गया था।

एक ही दिन में दो राज्यों में 11 नक्सलियों का सरेंडर
इसी दिन पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र में भी 7 बड़े इनामी नक्सलियों ने हथियार डाले। इन सातों पर कुल 82 लाख रुपये का इनाम था। इस तरह एक ही दिन में छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में कुल 11 नक्सलियों का आत्मसमर्पण नक्सल विरोधी अभियान के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

2026 तक नक्सलमुक्त भारत का संकल्प तेजी से साकार
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक देश को पूरी तरह नक्सलमुक्त बनाने का संकल्प लिया है। इसी क्रम में पिछले दो सालों में छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और ओडिशा में सुरक्षा बलों ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। नक्सलियों के बड़े-बड़े कमांडर या तो मारे जा चुके हैं या सरेंडर कर चुके हैं। उनकी सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा चुकी है। गाँव के लोग अब खुले आम नक्सलियों का विरोध करने लगे हैं और मुखबिरों की संख्या बढ़ गई है।

स्थानीय पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सरेंडर करने वाले नक्सलियों को छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति के तहत तत्काल राहत राशि, मकान, नौकरी और सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। कई नक्सली पहले से ही इस नीति का लाभ लेकर सामान्य जीवन जी रहे हैं और अब दूसरों को भी मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

नक्सली संगठन की कमर टूटने के संकेत
जो नक्सली कभी जंगल के राजा बनते थे, आज वे भूख, बीमारी और लगातार ऑपरेशन के दबाव में जीने को मजबूर हैं। महिलाएँ और बच्चे भी अब नक्सली कैंपों में नहीं रहना चाहते। यही कारण है कि पिछले एक साल में सैकड़ों नक्सलियों ने हथियार डाले हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ महीनों में और बड़े नाम सामने आ सकते हैं।

कांकेर में हुए इस सरेंडर से एक बार फिर साफ हो गया है कि सुरक्षा बलों की रणनीति काम कर रही है और नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। बस्तर के आदिवासी अब शांति, विकास और शिक्षा चाहते हैं, न कि बंदूक और बम की राजनीति। यह सरेंडर सिर्फ चार हथियारों का नहीं, बल्कि लाल आतंक के खात्मे की दिशा में एक और मजबूत कदम है।

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