By: Ravindra Sikarwar
ग्वालियर: सर्दी शुरू होते ही शहर के दोपहिया और पुराने चार पहिया वाहन चालकों का जीना मुहाल हो गया है। वजह है पेट्रोल में मिलाया जा रहा जरूरत से ज्यादा इथेनॉल। तेल कंपनियाँ सरकारी अनुमति से 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाने की बात कहती हैं, लेकिन हकीकत में यह 30 से 40 प्रतिशत तक पहुँच गया है। नतीजा यह कि बाइक-स्कूटी चलते-चलते अचानक बंद हो जा रही हैं, कभी बिना एक्सीलेटर दबाए तेज रफ्तार पकड़ लेती हैं और इंजन में झटके आने लगते हैं। मैकेनिकों की दुकानों पर रोजाना 20-25 वाहन इसी शिकायत के साथ पहुँच रहे हैं।
सर्दी में इथेनॉल बन रहा ‘जहर’
विशेषज्ञ बताते हैं कि इथेनॉल नमी सोखने की क्षमता रखता है। सर्दियों में हवा में नमी बढ़ने से यह कार्बोरेटर में जम जाता है और पेट्रोल का फ्लो बाधित कर देता है। पुरानी बाइक-स्प्लेंडर, पैशन प्रो, एक्टिवा, डियो जैसी गाड़ियों में यह समस्या सबसे ज्यादा दिख रही है। नए मॉडल में फ्यूल इंजेक्शन होने से थोड़ा कम प्रभाव पड़ता है, लेकिन वे भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।
पेट्रोल पंप कर्मचारी दबी जुबान में मान रहे हैं कि “ऊपर से जो माल आ रहा है, उसमें इथेनॉल की मात्रा बहुत ज्यादा है और ब्लेंडिंग भी ठीक नहीं हो रही।” शहर में रोजाना 6 लाख लीटर से ज्यादा पेट्रोल बिकता है, जिसमें से ज्यादातर साधारण पेट्रोल ही है। प्रीमियम पेट्रोल (114 रुपए लीटर) में यह शिकायत न के बराबर है, क्योंकि उसमें इथेनॉल कम या बिलकुल नहीं मिलाया जा रहा। नतीजतन लोग मजबूरी में महँगा पेट्रोल डलवाने को मजबूर हैं।
इथेनॉल सस्ता, मुनाफा भरपूर
इथेनॉल गन्ने से बनता है और कंपनियों को 35-45 रुपए लीटर पड़ता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर 106-107 रुपए लीटर में बेचा जा रहा है। जितना ज्यादा इथेनॉल मिलेगा, उतना ही कम पेट्रोल इस्तेमाल होगा और मुनाफा बढ़ेगा। यही वजह है कि तय सीमा लाँघी जा रही है। फरवरी 2025 में भी ठीक यही समस्या आई थी, जिसके बाद कुछ दिन सुधार हुआ था, लेकिन अब फिर वही सिलसिला शुरू हो गया है।
मैकेनिकों का अस्थायी जुगाड़
गाड़ी सुधारने वाले बताते हैं कि फिलहाल दो ही उपाय हैं:
- हर 15-20 दिन में कार्बोरेटर खुलवाकर साफ कराना (खर्च 300-600 रुपए)
- पेट्रोल भरवाते समय 50-100 मिली स्कूटी/बाइक का 2T ऑयल मिलवा लेना, ताकि चिकनाहट बनी रहे और इथेनॉल कम नुकसान करे।
अब तो ज्यादातर ग्राहक पेट्रोल के साथ ऑयल भी डलवा रहे हैं। कुछ लोग तो घर से ही छोटी बोतल में ऑयल लेकर पंप पर पहुँच रहे हैं।
क्या कहते हैं जानकार?
अमित सेठी, सचिव, ग्वालियर जिला पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने कहा, “पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से 20 प्रतिशत तक ही इथेनॉल मिलाने की अनुमति दी है, लेकिन कंपनियाँ इससे कहीं ज्यादा डाल रही हैं। सही ब्लेंडिंग भी नहीं हो रही। इसका खामियाजा आम उपभोक्ता भुगत रहा है।”
मशहूर मैकेनिक आरिफ खान ने बताया, “पिछले 15 दिनों में रोज 12-15 गाड़ियाँ सिर्फ इसी समस्या के कारण आ रही हैं। कार्बोरेटर में सफेदी जम जाती है, स्पार्क प्लग खराब हो जाते हैं। लंबे समय तक ऐसा चला तो इंजन की लाइफ भी कम हो जाएगी।”
लोग परेशान, प्रशासन मौन
वाहन चालक गुस्से में हैं। एक स्कूटी चालक ने कहा, “पेट्रोल के नाम पर पानी पिला रहे हैं। गाड़ी बीच रास्ते में बंद हो जाए तो क्या करें? मजबूरी में महँगा प्रीमियम डाल रहे हैं।” कई लोगों ने जिला प्रशासन और तेल कंपनियों से शिकायत की है, लेकिन अभी तक कोई ठोस जवाब नहीं आया।
पर्यावरण बचाने के नाम पर शुरू की गई इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति अब आम आदमी की जेब और वाहनों पर भारी पड़ रही है। जब तक तेल कंपनियाँ तय मानकों का सख्ती से पालन नहीं करेंगी और ब्लेंडिंग की गुणवत्ता नहीं सुधारेंगी, ग्वालियर ही नहीं, पूरे प्रदेश के वाहन चालकों की यह परेशानी खत्म होने वाली नहीं है।
