By: Ravindra Sikarwar
भारत में पारंपरिक औषधियों का इतिहास लंबा रहा है, लेकिन आधुनिक विज्ञान अब इन पर नई दृष्टि से शोध कर रहा है। ऐसा ही उदाहरण लखनऊ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की वह बड़ी खोज है, जिसने अल्ज़ाइमर जैसी असाध्य मानी जाने वाली बीमारी के उपचार में नई रोशनी दिखाई है। धार्मिक परंपराओं, पूजा-पद्धति और खानपान में शामिल पान का पत्ता अब चिकित्सा विज्ञान में अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़ चुका है।
अल्ज़ाइमर: बढ़ती वैश्विक चुनौती
अल्ज़ाइमर को दुनिया में डिमेंशिया का सबसे प्रमुख कारण माना जाता है। इस बीमारी में व्यक्ति की याददाश्त धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है और सोचने-समझने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। दुनिया में लाखों लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं और फिलहाल उपलब्ध दवाएँ केवल लक्षणों को कुछ समय के लिए नियंत्रित कर पाती हैं। पूरी तरह से उपचार अभी नहीं है, यही कारण है कि नए शोध और दवा खोज के प्रयास लगातार जारी हैं।
पान के पत्ते से दवा की दिशा में क्रांतिकारी खोज
लखनऊ विश्वविद्यालय की बायोजेरॉन्टोलॉजी और न्यूरोबायोलॉजी प्रयोगशाला ने पान के पत्ते से प्राप्त तत्व हाइड्रॉक्सीचाविकोल (Hydroxychavicol) पर शोध किया है। इस तत्व में पाए गए गुणों ने वैज्ञानिकों को उत्साहित किया है, क्योंकि यह मस्तिष्क में मौजूद उन प्रोटीनों को प्रभावित करता है जो अल्ज़ाइमर से जुड़े होते हैं।
इस शोध का नेतृत्व डॉ. नितीश राय और उनकी टीम कर रही है। उनके अनुसार, कंप्यूटर-आधारित ड्रग प्रेडिक्शन मॉडल और बायोइन्फॉर्मेटिक्स तकनीकों के जरिए यह पाया गया कि यह तत्व मस्तिष्क में बीमारी पैदा करने वाली प्रक्रियाओं को धीमा कर सकता है।
शोध के महत्वपूर्ण निष्कर्ष
- इस अध्ययन के दौरान 88 ऐसे जीन पहचाने गए जो अल्ज़ाइमर और हाइड्रॉक्सीचाविकोल दोनों से संबंधित पाए गए।
- इनमें से COMT, HSP1 और GAPDH नामक जीन और उनके प्रोटीन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते पाए गए।
- ये प्रोटीन ब्रेन सिग्नलिंग, न्यूरॉन संरक्षण और मस्तिष्क कोशिकाओं की ऊर्जा प्रणाली में अहम भूमिका निभाते हैं।
- अध्ययन में यह पाया गया कि हाइड्रॉक्सीचाविकोल इन प्रोटीनों से गहराई से जुड़कर बीमारी से लड़ने में उपयोगी हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया है कि यह तत्व शरीर द्वारा आसानी से अवशोषित हो जाता है, इसलिए इसे भविष्य में टैबलेट या कैप्सूल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
भविष्य की दिशा
हालाँकि यह शोध अभी प्रारंभिक अवस्था में है, लेकिन संभावनाएँ बेहद मजबूत हैं। अब अगला चरण प्रयोगशाला में जैविक परीक्षणों और फिर क्लिनिकल ट्रायल्स का होगा। यदि ये परीक्षण सफल होते हैं, तो आने वाले वर्षों में अल्ज़ाइमर रोगियों के लिए एक सुरक्षित, सस्ता और प्राकृतिक दवा विकल्प उपलब्ध हो सकता है।
डॉ. राय ने बताया कि पारंपरिक पौधों और भारतीय औषधीय प्रणालियों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने का यह प्रयास भविष्य में कई बीमारियों के लिए नई उम्मीदें जगाएगा।
पान का पत्ता जो अब तक केवल स्वाद, परंपरा और समाज से जुड़ा था, अब चिकित्सा क्षेत्र में अपना स्थान बनाने की ओर अग्रसर है। यदि यह शोध उम्मीदों के अनुरूप आगे बढ़ा, तो आने वाले समय में भारत से दुनिया को अल्ज़ाइमर के इलाज का एक प्रभावी और प्राकृतिक विकल्प मिल सकता है। यह खोज न केवल वैज्ञानिक उपलब्धि है बल्कि भारतीय वनस्पतियों की क्षमता का प्रमाण भी है।
