By: Ravindra Sikarwar
ग्वालियर में कथित रूप से सामने आए 25 करोड़ रुपए के जमीन आवंटन घोटाले पर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई का अंत हो गया है। स्पेशल कोर्ट (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) द्वारा प्रस्तुत की गई खात्मा रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। इस निर्णय के बाद ग्वालियर विकास प्राधिकरण (GDA) के सात अधिकारियों पर लगे आरोप औपचारिक रूप से समाप्त हो गए हैं।
यह पूरा मामला जड़ेरुआ कला क्षेत्र में भूमि आवंटन से जुड़ा था, जहां आरोप लगाया गया था कि GDA अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी कर गलत तरीके से जमीन आवंटित की और सरकारी खजाने को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया। शिकायत में दावा किया गया था कि इससे सरकार को लगभग 25 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
6 वर्षों तक चली जांच
2018 में दर्ज हुई शिकायत के बाद EOW ने मामले की व्यापक जांच शुरू की थी। अधिकारियों के बयान, दस्तावेज, भूमि आवंटन रिकॉर्ड और प्रशासनिक फाइलों की गहन जांच की गई। दावा किया गया था कि इस आवंटन में मिलीभगत और भ्रष्टाचार हुआ। लेकिन जांच के दौरान ठोस सबूत नहीं मिल सके।
EOW की रिपोर्ट के अनुसार:
- दस्तावेजों में कोई अनियमितता साबित नहीं हुई
- भूमि आवंटन प्रक्रिया कानून के अनुरूप पाई गई
- सरकारी नुकसान के दावों का प्रमाण नहीं मिला
- आरोप केवल संदिग्ध अनुमानों पर आधारित थे
इस आधार पर EOW ने कोर्ट में खात्मा रिपोर्ट पेश की और मामले को बंद करने की अनुशंसा की।
कोर्ट ने दिया अंतिम आदेश
स्पेशल कोर्ट ने जांच रिपोर्ट और दस्तावेजों की समीक्षा करने के बाद माना कि आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। इसके बाद अदालत ने:
- खात्मा रिपोर्ट स्वीकार की
- सभी सात आरोपियों को क्लीन चिट दी
- मामले को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया
कोर्ट के इस निर्णय के बाद आरोपियों और उनके परिवारों ने राहत की सांस ली।
कानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह मामला यह संकेत देता है कि केवल आरोप या अनुमान किसी पर मामला दर्ज करने का आधार नहीं हो सकते। किसी भी भ्रष्टाचार मामले में:
- वित्तीय हानि के तथ्य
- प्रक्रिया में अनियमितता
- आरोपी की भूमिका
इन तीनों को साबित करना आवश्यक होता है।
स्थानीय स्तर पर मिला मिला-जुला प्रतिक्रिया
कोर्ट के फैसले के बाद क्षेत्र में दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं:
- एक वर्ग इसे न्याय की जीत बता रहा है
- दूसरा वर्ग जांच की दिशा पर सवाल उठा रहा है और कह रहा है कि जांच सही तरीके से नहीं हुई
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव का शिकार हो सकता था।
क्या आगे होगा?
सूत्रों के अनुसार मामले में अब किसी प्रकार की आगे जांच या सुनवाई की संभावना बहुत कम है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट आदेश जारी कर दिया है। हालांकि, यदि किसी पक्ष को इससे आपत्ति है तो वह उच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है।
यह मामला लंबी जांच, कानूनी लड़ाई और प्रशासनिक जटिलताओं का उदाहरण है। आखिरकार, 6 साल बाद न्यायिक प्रक्रिया ने इसे खत्म कर दिया और सभी सात आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया गया।
