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By: Ravindra Sikarwar

वह भयावह रात जब हवा ने ली हजारों सांसें
2-3 दिसंबर 1984 की आधी रात। भोपाल सो रहा था। जाड़े की ठंडी रात में लोग गर्म कंबलों में दुबके थे। अचानक हवा में एक अजीब-सी जलन फैलने लगी। पहले तो लगा कि कोई धुआँ है, पर कुछ ही पलों में जलन आँखों, गले और फेफड़ों तक पहुँच गई। यूनियन कार्बाइड के कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) नाम की जानलेवा गैस का रिसाव शुरू हो चुका था। यह गैस इतनी घातक थी कि कुछ मिनटों में ही सैकड़ों लोग सड़कों पर गिरने लगे। जो जागे, वे चीखते-चिल्लाते घरों से बाहर निकले। “भागो! गैस लीक हो गई है!” यह चीख हर गली में गूँजने लगी। लोग अंधेरे में एक-दूसरे से टकराते, गिरते-पड़ते भाग रहे थे। माँ-बाप बच्चों को गोद में उठाकर दौड़े, कई बच्चे हाथ छूटकर रह गए। रिश्ते उस रात बेमानी हो गए थे। सिर्फ एक ही मकसद था – किसी तरह साँस बचाकर जिंदा रहना। जयप्रकाश नगर, जेपी नगर, चोला, टीला जमालपुरा, इत्तेफाक नगर – पुराने भोपाल के ये सारे इलाके मौत के साये में डूब गए। सड़कें, गलियाँ, छतें – हर जगह लाशें बिखर गईं। सुबह तक आधिकारिक आँकड़ा 2,000 से ऊपर पहुँच चुका था, पर सच यह था कि पहले 48 घंटों में ही 8,000 से ज्यादा लोग मर चुके थे। यह दुनिया की सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटना थी, जिसने एक झटके में पूरी पीढ़ी को अपंग बना दिया।

भागते लोग और टूटते रिश्ते
उस रात का सबसे दर्दनाक पहलू था इंसान का इंसान से दूर हो जाना। जो कल तक एक-दूसरे के लिए जान देने को तैयार थे, वे एक-दूसरे को पीछे छोड़कर भाग रहे थे। एक बुजुर्ग दंपति ने बताया था कि उनका बेटा उन्हें छोड़कर भाग गया, क्योंकि वह अपनी पत्नी और बच्चों को बचाना चाहता था। एक माँ ने दो बच्चों को गोद में लिया और तीसरे का हाथ पकड़ा था, पर भीड़ के धक्के में बच्चा छूट गया। कई लोग तो घर से सिर्फ चादर ओढ़कर निकले थे। रात के दो बजे सिहोर-रायसेन रोड पर हजारों लोग बेतरतीब दौड़ रहे थे। रिक्शे, साइकिलें, स्कूटर – जो मिला, उस पर सवार होकर लोग भागे। कई लोग तो नंगे पाँव ही शहर से बाहर निकल गए। उस रात भोपाल के लोगों ने मौत को इतने करीब से देखा था कि कई सालों तक लोग रात में खाँसी की आवाज सुनकर चौंक उठते थे। गैस का असर सिर्फ उन पर नहीं हुआ जो कारखाने के पास थे; हवा ने इसे कई किलोमीटर तक फैला दिया। हमीदिया अस्पताल, सुल्तानिया जनाना अस्पताल, जहाँगीराबाद के छोटे-छोटे क्लीनिक – सब लाशों और तड़पते लोगों से पट गए। डॉक्टरों के पास न दवा थी, न जानकारी कि इस गैस का इलाज क्या है। ऑक्सीजन सिलिंडर कम पड़ गए। कई लोग तो अस्पताल पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ चुके थे।

राहत का नाम पर राजनीति और मुआवजे का खेल
हादसे के कुछ दिनों बाद नेता पहुँचने लगे। श्रद्धांजलि, भाषण, आँसू और वादे – सब कुछ हुआ। अंतरिम राहत के नाम पर कुछ हजार रुपये बाँटे गए। 1989 में यूनियन कार्बाइड और भारत सरकार के बीच हुए समझौते में कुल 470 मिलियन डॉलर (तब के लगभग 715 करोड़ रुपये) मुआवजे के रूप में तय हुए। पर यह राशि इतनी कम थी कि प्रति मृतक परिवार को औसतन 60-70 हजार रुपये और घायलों को 25-30 हजार रुपये ही मिले। कई परिवारों को तो आज तक पूरा मुआवजा नहीं मिला। सबसे दुखद था फर्जी पीड़ितों का खेल। हजारों लोग जो उस इलाके में रहते ही नहीं थे, उन्होंने भी गैस पीड़ित होने का दावा कर मुआवजा ले लिया। दूसरी तरफ असली पीड़ित कागज-पत्र के चक्कर में भटकते रहे। आज भी कई बुजुर्ग और महिलाएँ मुआवजे की आखिरी किस्त के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं।

जहरीला कचरा: दूसरी गैस त्रासदी
कारखाने में छोड़ा गया 350 टन से ज्यादा जहरीला कचरा आज भी भोपाल के लिए दूसरी त्रासदी बना हुआ है। कई सालों तक यह कचरा कारखाने के अंदर ही पड़ा रहा। बारिश का पानी उसमें मिलता रहा और भूजल को जहरीला बनाता रहा। आसपास के कुओं का पानी पीने से लोग कैंसर, अंधापन, जन्मजात विकृति जैसी बीमारियों के शिकार होते रहे। 2004 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भोपाल के लोगों को साफ पानी मुहैया कराने की योजना शुरू हुई, पर आज भी कई बस्तियाँ दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। 2014-15 में पीथमपुर (धार जिला) में इस कचरे को नष्ट करने का फैसला हुआ। परीक्षण के बाद इसे जलाया गया, पर वहाँ के लोग आज भी डर के साये में जी रहे हैं। कई वैज्ञानिकों का कहना है कि यह कचरा पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ; उसकी राख भी खतरनाक है।

चालीस साल बाद भी नहीं सूखा जख्म
आज जब भोपाल गैस त्रासदी के चालीस साल पूरे हो रहे हैं, तब भी हजारों परिवार उस रात की त्रासदी झेल रहे हैं। दूसरी-तीसरी पीढ़ी तक जन्मजात विकृति, फेफड़ों की बीमारियाँ, कैंसर और मानसिक आघात देखने को मिल रहे हैं। कई बच्चे आज भी बिना आँखों के, बिना हाथ-पैर के या दिमागी रूप से अक्षम पैदा हो रहे हैं। चिंगारी ट्रस्ट, भोपाल मेडिकल अपील जैसी संस्थाएँ आज भी इन बच्चों का सहारा बनी हुई हैं। हर साल 3 दिसंबर को यूनियन कार्बाइड के पुराने कारखाने के सामने लोग मोमबत्तियाँ जलाते हैं, नारे लगाते हैं – “वारेन एंडरसन को फाँसी दो”, “डाउ केमिकल माफी माँगे”। क्योंकि यूनियन कार्बाइड को 2001 में डाउ केमिकल ने खरीद लिया था, पर आज तक उसने कोई जिम्मेदारी नहीं ली। तत्कालीन सीईओ वारेन एंडरसन को भारत लाया गया था, पर कुछ घंटों में ही उसे भोपाल से भगाया गया। वह 2014 में अमेरिका में मरा, पर कभी भारत नहीं लौटा।

आखिरी सवाल: क्या हमने कुछ सीखा?
चालीस साल बाद भी भोपाल सवाल पूछता है – क्या कॉर्पोरेट लापरवाही की इतनी बड़ी कीमत सिर्फ गरीबों को ही चुकानी पड़ती है? क्या सुरक्षा के नाम पर खानापूरी करने वाली कंपनियाँ और उन्हें संरक्षण देने वाली सरकारें कभी जवाबदेह होंगी? भोपाल ने दुनिया को बहुत कुछ सिखाया – पर्यावरण कानूनों को सख्त करने से लेकर आपदा प्रबंधन तक। पर आज भी देश में कई कारखाने ऐसे हैं जहाँ सुरक्षा के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूरी होती है। भोपाल का जख्म कभी नहीं भर सकता, पर कम से कम हम यह संकल्प तो ले सकते हैं कि ऐसी त्रासदी दोबारा न हो। उस रात मरने वालों को तो हम वापस नहीं ला सकते, पर जो बचे हैं, उनके लिए न्याय, सम्मान और बेहतर इलाज की लड़ाई अभी भी जारी है। यह लड़ाई सिर्फ भोपाल की नहीं, पूरी मानवता की है।

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