By: Ravindra Sikarwar
शुक्रवार का दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पूरी तरह आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक गौरव से भरा रहा। कर्नाटक से शुरू हुई उनकी यात्रा गोवा में समाप्त हुई, जहां हर कदम पर भक्ति, उत्साह और भारत की प्राचीन परंपराओं का पुनर्जागरण दिखाई दिया।
उडुपी में भक्ति की लहर
सुबह सबसे पहले पीएम मोदी कर्नाटक के प्रसिद्ध उडुपी श्रीकृष्ण मठ पहुंचे। यहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और नवनिर्मित सुवर्ण तीर्थ मंडप का लोकार्पण किया। साथ ही कनकना किंडी के लिए विशेष स्वर्ण कवच भी अर्पित किया। मठ के महंतों ने उन्हें पुष्पमाला पहनाकर स्वागत किया।
इसके बाद एमजी ग्राउंड में करीब एक लाख से ज्यादा लोगों के साथ प्रधानमंत्री ने सामूहिक श्रीमद्भगवद्गीता पाठ किया। एक साथ गूंजते श्लोकों ने पूरे वातावरण को दिव्य ऊर्जा से भर दिया। पीएम ने कहा, “जब लाखों लोग एक स्वर में गीता पढ़ते हैं, तो उससे जो शक्ति पैदा होती है, वह मन-मस्तिष्क को नई प्रेरणा और संकल्प देती है।”
एयरपोर्ट से मठ तक करीब 3 किलोमीटर लंबे रोड शो में जनसैलाब उमड़ा। लोग फूल बरसाते और नारे लगाते दिखे।
गोवा में 77 फीट श्रीराम प्रतिमा का भव्य अनावरण
शाम को पीएम दक्षिण गोवा के कैनाकोना स्थित श्री संस्थान गोकर्ण पर्तगली जीवोत्तम मठ पहुंचे। यह मठ गौड़ सारस्वत ब्राह्मण वैष्णव संप्रदाय का सबसे प्राचीन और प्रमुख केंद्र है। यहां उन्होंने विश्व प्रसिद्ध मूर्तिकार पद्मभूषण राम वी. सुतार (जिन्होंने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भी बनाई है) द्वारा निर्मित 77 फीट ऊँची कांस्य श्रीराम प्रतिमा का अनावरण किया।
साथ ही मठ परिसर में बने रामायण थीम पार्क का भी उद्घाटन किया, जो आधुनिक तकनीक और पारंपरिक कथाओं के संयोजन से युवा पीढ़ी को रामायण की शिक्षा रोचक ढंग से देगा।
पीएम की प्रमुख बातें (संक्षेप में)
- उडुपी से सुशासन और जनसंघ की राजनीति की शुरुआत हुई थी।
- द्वारका और उडुपी का आध्यात्मिक रिश्ता हजारों वर्ष पुराना है।
- गीता का संदेश है – अत्याचार के खिलाफ खड़ा होना जरूरी है; यही आज की भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का आधार भी है।
- पहले आतंकी हमलों का जवाब नहीं देते थे, आज का भारत घर में घुसकर जवाब देता है।
- गोवा ने सदियों की परतंत्रता में भी अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी, पर्तगली मठ जैसे केंद्रों ने इसे जीवित रखा।
- अयोध्या, काशी, उज्जैन और अब गोवा – पूरे देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण चल रहा है।
कर्नाटक से गोवा तक एक ही दिन में इतनी बड़ी आध्यात्मिक-सांस्कृतिक यात्रा शायद ही पहले कभी देखने को मिली हो। लोगों का उत्साह बता रहा था कि भारत अपनी जड़ों की ओर तेजी से लौट रहा है।
