By: Ravindra Sikarwar
ग्वालियर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने नगर निगम के अधिकारियों को बड़ी कानूनी राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने विशेष सत्र न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) द्वारा नगर निगम के कुछ अधिकारियों के खिलाफ लिए गए संज्ञान आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खुले में मांस की बिक्री और अवैध बूचड़खानों पर की गई कार्रवाई पूरी तरह कानून सम्मत थी और इसके लिए किसी पूर्व सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं थी।
यह मामला वर्ष 2021-2022 का है जब ग्वालियर नगर निगम ने शहर में स्वच्छता अभियान के तहत कई जगहों पर खुले में मांस बेचने वालों और अवैध बूचड़खानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की थी। निगम की टीम ने दुकानों पर छापे मारे, मांस जब्त किया और कुछ जगहों पर सीलिंग की कार्रवाई भी की। इस दौरान कई दुकानदारों और मांस व्यापारियों ने आरोप लगाया कि निगम अधिकारियों ने उनके साथ मारपीट की, जबरन दुकानें बंद कराईं और बिना उचित नोटिस के सामान जब्त किया।
इन शिकायतों के आधार पर कुछ प्रभावशाली मांस व्यापारियों ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और अन्य धाराओं के तहत नगर निगम के तत्कालीन जोनल अधिकारी, स्वास्थ्य अधिकारी और अन्य कर्मचारियों के खिलाफ विशेष न्यायालय में परिवाद दायर किया था। विशेष न्यायालय ने बिना सरकारी अभियोजन स्वीकृति (सेक्शन 19 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत) के ही अधिकारियों के खिलाफ संज्ञान ले लिया था और मामला दर्ज कर लिया था।
नगर निगम के अधिकारियों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका पक्ष था कि खुले में मांस की बिक्री और अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 307, 308 और खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम तथा सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत की गई थी। यह कार्रवाई सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई थी, न कि किसी निजी लाभ या दुर्भावना से। इसलिए इसमें भ्रष्टाचार का कोई मामला बनता ही नहीं है और न ही इसके लिए सरकारी अनुमति की जरूरत थी।
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने अधिकारियों के तर्कों से सहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि नगर निगम के अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे थे। खुले में मांस बिक्री और अवैध बूचड़खाना चलाना स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार इस तरह की गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि जब कार्रवाई ही विधि सम्मत है और सार्वजनिक हित में की गई है, तो उसे भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
न्यायाधीश ने विशेष न्यायालय के संज्ञान आदेश को “कानूनी रूप से अस्थिर” करार देते हुए रद्द कर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में भी इस तरह की स्वच्छता और कानून व्यवस्था से जुड़ी कार्रवाइयों के लिए अलग से सरकारी अनुमति लेने की बाध्यता नहीं होगी, बशर्ते कार्रवाई नियमानुसार और बिना व्यक्तिगत दुर्भावना के की जाए।
इस फैसले से न केवल ग्वालियर बल्कि पूरे प्रदेश के नगर निगम अधिकारियों में राहत की लहर है। कई अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के परिवादों से डरकर अब तक वे सख्त कार्रवाई करने से हिचकते थे, लेकिन हाईकोर्ट का यह निर्णय उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा।
वहीं दूसरी ओर कुछ मांस व्यापारी संगठनों ने इस फैसले पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि कई बार निगम की कार्रवाई मनमानी होती है और छोटे व्यापारियों को परेशान किया जाता है। वे इस फैसले के खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील करने की तैयारी कर रहे हैं।
कुल मिलाकर ग्वालियर हाईकोर्ट का यह फैसला नगर निगमों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी संरक्षण साबित हुआ है और भविष्य में स्वच्छता अभियानों को और तेज करने का रास्ता खोलेगा।
