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By: Ravindra Sikarwar

ग्वालियर: आज देश भर में संविधान दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा है और ग्वालियर में इस मौके को यादगार बनाने के लिए कुछ ऐसा होने जा रहा है, जिसका इंतज़ार शहर के लोग सालों से कर रहे थे। महाराज बाड़े स्थित ऐतिहासिक केंद्रीय पुस्तकालय में भारत के संविधान की हस्तलिखित मूल प्रति को आम लोगों के दर्शन-पूजन के लिए प्रदर्शित किया जा रहा है। यह वही बेशकीमती दस्तावेज़ है जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति ने तैयार किया था और जिस पर 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा के सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे। खास बात यह है कि देश में कुल 16 हस्तलिखित मूल प्रतियाँ तैयार की गई थीं और इनमें से एक प्रतिलिपि पिछले कई दशकों से ग्वालियर की सेंट्रल लाइब्रेरी की तिजोरी में सुरक्षित रखी हुई है। आज पहली बार इसे कड़े सुरक्षा घेरे में विशेष शीशे के केस में रखकर जनता के सामने लाया जा रहा है।

सुबह से ही लाइब्रेरी के बाहर लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई हैं। विद्यार्थी, वकील, शिक्षक, बुजुर्ग और आम नागरिक—हर उम्र के लोग हाथों में तिरंगा लिए इंतज़ार कर रहे हैं। कोई इसे देश के लोकतंत्र का सबसे पवित्र ग्रंथ मान रहा है तो कोई डॉ. आंबेडकर के प्रति श्रद्धांजलि देने आया है। लाइब्रेरी के निदेशक डॉ. आर.के. शर्मा ने बताया कि यह मूल प्रति शांतिनिकेतन के प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बोस और उनके शिष्यों द्वारा सुंदर कलाकृतियों से सजाई गई है। हर पृष्ठ पर भारतीय संस्कृति, इतिहास और सभ्यता के प्रतीक चित्र बने हैं। पन्नों को सोने के पानी से मढ़ा गया है और अक्षर इतने सुंदर हैं कि देखते ही बनता है। इसे देखने के लिए विशेष पास की व्यवस्था की गई है, लेकिन संविधान दिवस के अवसर पर आज पूरे दिन कोई पास नहीं लगेगा—बस श्रद्धा और अनुशासन चाहिए।

सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए गए हैं। लाइब्रेरी परिसर में सीसीटीवी कैमरे, मेटल डिटेक्टर और पुलिस बल तैनात है। संविधान की इस मूल प्रति को देखने के लिए एक विशेष गैलरी बनाई गई है, जहाँ एक बार में 50 लोग ही प्रवेश कर सकेंगे। हर व्यक्ति को सिर्फ दो मिनट का समय मिलेगा ताकि कतार आगे बढ़ती रहे। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक यह प्रदर्शनी खुलेगी। जिला प्रशासन और संस्कृति विभाग के अधिकारी खुद मौके पर मौजूद रहेंगे। कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह ने कहा, “यह ग्वालियर के लिए गर्व की बात है कि हमारे पास संविधान की मूल प्रति है। आज का दिन हर नागरिक को यह याद दिलाने का है कि हमारा संविधान सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि समता, स्वतंत्रता और न्याय का जीता-जागता प्रमाण है।”

शहर के कई स्कूल-कॉलेजों ने अपने छात्रों को ग्रुप में लाने की घोषणा की है। लक्ष्मीबाई कॉलेज, जीवाजी यूनिवर्सिटी और कई निजी संस्थानों के छात्र बसों में सवार होकर पहुँच रहे हैं। कुछ लोग तो फूल मालाएँ और अगरबत्ती लेकर आ रहे हैं, मानो किसी तीर्थ के दर्शन कर रहे हों। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर प्रसाद शर्मा भावुक स्वर में कहते हैं, “मैंने किताबों में पढ़ा था, आज अपनी आँखों से देख रहा हूँ कि जिस कलम से बाबासाहेब ने हमें अधिकार दिए, वह आज भी जिंदा है।” वहीं एक 12वीं की छात्रा रिया कुशवाह ने कहा, “हमारे टीचर कहते हैं कि संविधान हमारा सबसे बड़ा अधिकार पत्र है। आज इसे छूने का मन कर रहा है।”

यह पहला मौका नहीं जब सेंट्रल लाइब्रेरी ने अपनी इस अनमोल धरोहर को बाहर निकाला हो। पिछले साल भी गणतंत्र दिवस पर कुछ घंटों के लिए इसे दिखाया गया था, लेकिन उस दिन भीड़ इतनी थी कि हजारों लोग लौट गए थे। इस बार प्रशासन ने पूरी तैयारी कर रखी है। लाइब्रेरी परिसर में संविधान की प्रस्तावना की बड़ी-बड़ी प्रतियाँ लगाई गई हैं और “हम भारत के लोग…” को सामूहिक रूप से पढ़ने का कार्यक्रम भी रखा गया है। शाम को सांस्कृतिक संध्या का आयोजन होगा जिसमें स्थानीय कलाकार संविधान से प्रेरित गीत और कविताएँ प्रस्तुत करेंगे।

ग्वालियर की यह पहचान अब देश भर में चर्चा का विषय बन गई है। लोग हैरान हैं कि दिल्ली की संसद भवन लाइब्रेरी के बाद दूसरी मूल प्रति मध्य प्रदेश के इस शहर में कैसे पहुँची। इतिहासकार बताते हैं कि आज़ादी के बाद ये प्रतियाँ विभिन्न महत्वपूर्ण स्थानों पर रखी गई थीं और ग्वालियर को यह सम्मान इसलिए मिला क्योंकि यहाँ की रियासत ने संविधान निर्माण में सक्रिय योगदान दिया था। आज संविधान दिवस पर ग्वालियर एक बार फिर देश को याद दिला रहा है कि लोकतंत्र की सबसे मजबूत जड़ें छोटे-छोटे शहरों में भी हैं। अगर आप ग्वालियर में हैं या आसपास हैं तो आज का दिन इतिहास के पन्नों को अपनी आँखों से देखने का सुनहरा अवसर है।

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