By: Ravindra Sikarwar
भारत और रूस के रक्षा संबंध एक बार फिर चर्चा में हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की प्रस्तावित भारत-यात्रा से पहले यह अटकलें तेज़ हो गई हैं कि मॉस्को नई दिल्ली को अपना नया स्टेल्थ फाइटर Su-75 ‘चेकमेट’ औपचारिक रूप से पेश कर सकता है। इस बात ने दुनिया का ध्यान खींचा है क्योंकि यह वही प्रोजेक्ट है जिसे रूस, अमेरिकी F-35 और चीनी J-20 का सबसे प्रभावी जवाब मानता है। इसके अलावा S-400 सिस्टम की अतिरिक्त यूनिट्स पर भी बातचीत होने की संभावना है।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि स्टेल्थ तकनीक क्यों इतनी महत्वपूर्ण है, रूस ने इस तकनीक में कैसे महारत हासिल की, और Su-75 को दुनिया के सबसे संभावित गेम-चेंजर फाइटर्स में क्यों गिना जा रहा है।
भारत-रूस रक्षा साझेदारी—कूटनीति से आगे बढ़कर रणनीतिक भरोसा
भारत और रूस कई दशकों से एक-दूसरे के विश्वसनीय साझेदार हैं। भारतीय वायुसेना के बेड़े का बड़ा हिस्सा आज भी रूसी प्लेटफॉर्म्स पर आधारित है—मिग श्रृंखला से लेकर सुखोई-30MKI तक। नौसेना का प्रमुख युद्धपोत INS विक्रमादित्य भी रूस द्वारा ही निर्मित है। संयुक्त राष्ट्र में कई बार रूस ने भारत को राजनीतिक समर्थन दिया है। इसलिए, जब भी दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मुलाकात होती है, दुनिया के विश्लेषकों की नज़रें टिक जाती हैं।
दिसंबर में संभावित पुतिन-मोडी बैठक में रणनीतिक हथियारों और हाई-टेक एविएशन पर चर्चाएं होना लगभग तय माना जा रहा है। और इसी संदर्भ में रूस का अगली पीढ़ी का फाइटर—Su-75—केंद्र में आ गया है।
स्टेल्थ तकनीक—भविष्य के युद्ध की अनिवार्य जरूरत
किसी भी आधुनिक वायु सेना का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है—बिना दिखे हमला करना। युद्धक्षेत्र में पहली उपलब्धि हमेशा उसी को मिलती है जिसे दुश्मन देख न सके। इसी अवधारणा के कारण स्टेल्थ तकनीक इतनी महत्वपूर्ण है।
रडार की तकनीक को समझें तो यह लगातार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें छोड़ता है और लौटकर आने वाली तरंगों से वस्तु की उपस्थिति, आकार और दूरी का पता लगाता है। परंतु स्टेल्थ विमानों का डिजाइन रडार तरंगों को “इधर-उधर” बिखेर देता है, जिससे रडार ऑब्जेक्ट को सही तरीके से पहचान ही नहीं पाता। इसके अलावा इन विमानों पर विशेष रडार-अवशोषक (Radar Absorbing) सामग्री लगाई जाती है जो तरंगों को सोख लेती है।
यानी स्टेल्थ तकनीक दो मोर्चों पर काम करती है—दिखने भी न दो, और पकड़े जाओ तो पहचान न हो।
क्या रूस ने स्टेल्थ तकनीक की नींव रखी?
स्टेल्थ टेक्नोलॉजी को आज भले ही अमेरिका का “स्पेशल ब्रांड” माना जाता है—जैसे F-22 और F-35—लेकिन इसकी शुरुआत रूस में ही हुई थी। 1960 के दशक में सोवियत वैज्ञानिक प्योत्र उफिम्तसेव ने रडार तरंगों को कैसे मोड़ा जा सकता है, इस पर काम किया। उन्होंने सतहों पर तरंगों के बिखराव का गणितीय मॉडल तैयार किया। उस समय USSR ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अमेरिकी कंपनी Lockheed ने इस शोध को अपने पहले स्टेल्थ विमान F-117 Nighthawk के विकास में लागू कर दिया।
यानी आज की आधुनिक स्टेल्थ तकनीक की जड़ें रूस की ही प्रयोगशाला में थीं।
अब आते हैं असली विषय पर—रूस का Su-75 ‘चेकमेट’
रूस ने इस विमान को 2021 में पहली बार दुनिया के सामने पेश किया था। सुखोई डिज़ाइन ब्यूरो के अनुसार, यह विमान आने वाली पीढ़ी के संघर्षों को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है—कम दिखाई देने वाला, तेज़, हल्का, अत्याधुनिक और कम लागत वाला।
इसका नाम “Checkmate” यानी “शह-मात” भी इस बात का संकेत है कि रूस इसे पश्चिमी विमानों की काट के रूप में पेश करना चाहता है।
डिज़ाइन में बड़े बदलाव—Su-75 अब पहले से ज्यादा घातक
सुखोई ने शुरुआती प्रोटोटाइप में कई सुधार किए हैं:
1. बेहतर एयरोडायनैमिक्स
- इसके फ्लैपरॉन्स का आकार बढ़ा दिया गया है।
- इससे विमान को करतब दिखाने (मैनुवरिंग) में कई गुना मदद मिलती है।
- तेज कम्पैट डॉगफाइट में यह विशेषता निर्णायक होती है।
2. Su-57 जैसी उन्नत एवियॉनिक्स
- इसका इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बड़े भाई Su-57 से लिया गया है।
- AI आधारित सहायक पायलट प्रणाली जो युद्ध के दौरान पायलट का बोझ कम करती है।
- मल्टी-रोल सेंसर जो आवश्यकता के अनुसार बदले जा सकें।
3. अंदर छिपा हुआ हथियार तंत्र (Internal Weapon Bay)
स्टेल्थ क्षमता बनाये रखने के लिए हथियार शरीर के अंदर रखे जाते हैं:
- कुल 5 इंटरनल वेपन बे
- लगभग 7400 किलोग्राम पेलोड
- गैर-स्टेल्थ मिशनों के लिए बाहरी 11 हार्डपॉइंट भी उपलब्ध
4. कम लागत—F-35 का सबसे बड़ा मुकाबला
रूसी सूत्रों के अनुसार:
- इस विमान की उड़ान लागत F-35 की तुलना में लगभग 5–6 गुना कम होगी।
- यह उन देशों के लिए आकर्षक विकल्प बन जाता है जो स्टेल्थ चाहते तो हैं, लेकिन अरबों डॉलर खर्च नहीं कर सकते।
Su-75 की गति, रेंज और सुपरक्रूज़ क्षमता
सुखोई के अनुसार:
- अधिकतम गति: मैक 1.8 से 2.0 (ध्वनि की गति से लगभग दोगुनी)
- रेंज: 3000 किलोमीटर तक
- सुपरक्रूज़ क्षमता: यानी बिना आफ्टरबर्नर के भी सुपरसॉनिक उड़ान।
- यह क्षमता आज केवल चुनिंदा पांचवीं पीढ़ी के जेट्स—जैसे F-22—में है।
यानी Su-75 आधुनिक तकनीक और लागत-प्रभावशीलता का असामान्य संयोजन है।
भारत के लिए यह विमान क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?
भारत 2030 के दशक तक अपनी वायुसेना को “फ्यूचर एयर कॉम्बैट फोर्स” में बदलने की योजना बना चुका है।
पर चुनौतियाँ हैं:
- पुराने मिग-21 रिटायर हो चुके हैं
- मिग-29 और मिराज-2000 तीसरी दशक में पहुँच रहे हैं
- AMCA स्टेल्थ फाइटर अभी विकास चरण में है
जब तक AMCA ऑपरेशनल नहीं होता, भारत को एक विश्वसनीय स्टेल्थ प्लेटफॉर्म की आवश्यकता होगी।
Su-75 इसी खाली जगह को भर सकता है।
Make in India की संभावना
मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि रूस Su-75 का संयुक्त उत्पादन भारत में करने का प्रस्ताव दे सकता है।
यदि ऐसा हुआ, तो यह—
- भारत की स्टेल्थ टेक्नोलॉजी
- उन्नत एविएशन मैन्युफैक्चरिंग
- और सप्लाई चेन
इन सभी क्षेत्रों में बड़ा उछाल दे सकता है।
क्या Su-75, F-35 और J-20 के मुकाबले टिक सकता है?
1. F-35 की तुलना
- F-35 का सबसे बड़ा फायदा है—नाटो का समर्थन, सॉफ्टवेयर नेटवर्क और बैटल-प्रूवन स्टेटस।
- लेकिन Su-75 इसकी आधी से भी कम कीमत पर समान स्टेल्थ क्षमताएँ देने का दावा करता है।
2. चीन के J-20 की तुलना
- J-20 भारी और बड़ा twin-engine विमान है।
- पर विशेषज्ञ मानते हैं कि Su-75 जैसा सिंगल इंजन स्टेल्थ जेट दक्षिण एशिया में ज्यादा उपयुक्त होगा, खासकर उच्च ऊँचाई वाले मिशनों में।
3. भारत को क्या मिलेगा?
- स्टेल्थ तकनीक
- बेहतर रेंज
- आधुनिक सेंसर
- कम ऑपरेटिंग कॉस्ट
- और भविष्य में Su-57 आधारित तकनीक का लाभ
इन सभी कारणों से भारत के लिए Su-75 एक आकर्षक विकल्प बन सकता है।
पुतिन की यात्रा से पहले माहौल गर्म—क्या डील संभव है?
रूस चाहता है कि Su-75 को वैश्विक बाज़ार में स्थापित किया जाए।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार है और रूस का पारंपरिक मित्र भी।
दोनों की ज़रूरतें और संभावनाएँ मेल खाती हैं।
इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि:
- भारत Su-75 की तकनीकी जानकारी
- संयुक्त उत्पादन
- और S-400 की नई यूनिट्स
इन सब पर चर्चा कर सकता है।
यह भी संभव है कि भारत पहले कुछ प्रोटोटाइप हासिल करे और उनके परीक्षण के बाद खरीद पर फैसला ले।
क्या भारत Su-75 खरीदेगा?
अभी इस पर सरकारी स्तर पर कुछ भी आधिकारिक नहीं है, लेकिन संकेत साफ हैं—
- भारत स्टेल्थ क्षमताएँ चाहता है
- रूस अपने नए विमान को भारत को पेश करने के लिए उत्सुक है
और दोनों देशों के बीच मजबूत रणनीतिक भरोसा मौजूद है
यदि Su-75 ‘चेकमेट’ भारत में आता है, तो यह भारतीय वायुसेना के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी छलांगों में से एक हो सकती है—और एशिया की सामरिक शक्ति संतुलन को बदल सकती है।
