By: Ravindra Sikarwar
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले से एक बेहद चौंकाने वाली और संवेदनाओं को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों को उजागर कर दिया है। यहां एक गर्भवती महिला को अचानक तेज प्रसव पीड़ा उठी, जिसके बाद परिजनों ने तुरंत 108 एम्बुलेंस सेवा को कॉल किया और उम्मीद की कि सरकारी चिकित्सा व्यवस्था समय पर मदद पहुंचाएगी। लेकिन परिवार के अनुसार, कॉल के बावजूद एम्बुलेंस मौके पर नहीं पहुंची, जिससे स्थिति गंभीर होती चली गई। मजबूर होकर परिवार ने आसपास से गुजर रहे एक ई-रिक्शा को रोका और महिला को जिला कॉलेज अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही महिला ने चलती रिक्शा में ही बच्चे को जन्म दे दिया। रास्ते में तेज पीड़ा और तनाव के बीच महिला की हालत बिगड़ती गई, परिजनों के चेहरे पर डर साफ नजर आ रहा था और रिक्शा चालक भी घबराया हुआ था, लेकिन उसने हिम्मत दिखाते हुए तेजी से वाहन को अस्पताल की तरफ मोड़ा। सड़क पर चलते रिक्शा में अचानक शुरू हुए प्रसव ने सभी को भयभीत कर दिया, लेकिन महिला ने असहनीय वेदना के बीच नवजात को जन्म दिया। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों की टीम सक्रिय हो गई और तुरंत नवजात और मां दोनों को उपचार के लिए ले जाया गया। अस्पताल प्रबंधन ने बताया कि समय पर देखभाल होने से दोनों की हालत अब स्थिर है और जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। इस बीच परिजनों ने आरोप लगाया कि यदि एम्बुलेंस समय पर पहुंच जाती, तो यह स्थिति नहीं बनती। उनका कहना है कि उन्होंने कई बार हेल्पलाइन नंबर पर कॉल किया, लोकेशन भी बताई, लेकिन एम्बुलेंस मौके पर नहीं आई और उन्हें मजबूर होकर निजी वाहन का सहारा लेना पड़ा। परिजनों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि यह लापरवाही केवल तनाव ही नहीं, बल्कि जान जोखिम में डालने वाली थी। वहीं स्वास्थ्य विभाग इस मामले के सामने आने के बाद हरकत में आया और अधिकारियों ने बयान जारी करते हुए कहा कि एम्बुलेंस सेवा में देरी के कारणों की जांच की जाएगी और यदि किसी भी तरह की लापरवाही पाई गई तो संबंधित कर्मचारियों पर उचित कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि यह गंभीर मामला है और इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है। यह घटना न केवल एक परिवार के दर्द का सबूत है, बल्कि ग्रामीण और छोटे शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति को भी सामने लाती है, जहां एम्बुलेंस जैसी मूलभूत सुविधा का समय पर न मिलना अब भी आम बात है। कई बार प्रसव, दुर्घटना या गंभीर बीमारी के दौरान लोगों को निजी वाहनों में अस्पताल पहुंचना पड़ता है और कई मामलों में मरीज समय पर उपचार न मिलने के कारण खतरे में भी पड़ जाते हैं। कोरबा की यह घटना सौभाग्य से किसी बड़ी त्रासदी में नहीं बदली, लेकिन इसने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या स्वास्थ्य सेवाएं तभी सुधरेंगी जब ऐसी घटनाएं बार-बार लोगों की जान जोखिम में डालेंगी? यह मामला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और सरकार सभी के लिए चेतावनी है कि व्यवस्था में तुरंत सुधार किए जाएं, ताकि किसी भी महिला को जीवन के इस संवेदनशील क्षण में ऐसी विपरीत परिस्थिति का सामना न करना पड़े।
