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by-Ravindra Sikarwar

प्राकृतिक चिकित्सा की अवधारणा और पंचमहाभूतों का महत्व:
प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) एक प्राचीन विधि है, जो प्रकृति के मूलभूत सिद्धांतों से जुड़ी हुई है। यह चिकित्सा पद्धति इस विचार पर आधारित है कि हमारा जीवन और स्वास्थ्य पंचमहाभूतों (पाँच तत्वों) के संतुलन पर निर्भर करता है। ये पाँच तत्व हैं:

  • आकाश (ईथर)
  • वायु (हवा)
  • अग्नि (ऊर्जा/गर्मी)
  • जल (पानी)
  • पृथ्वी (मिट्टी/ठोस पदार्थ)

हम सभी जीवों और प्राणियों का शरीर इन्हीं पाँच तत्वों से मिलकर बना है। प्राकृतिक चिकित्सा का मूल मंत्र यही है कि मनुष्य अपनी जीवनशैली को इस तरह से अपनाए कि इन तत्वों का संतुलन शरीर में बना रहे। जिस प्रकार प्रकृति में इन तत्वों का असंतुलन प्राकृतिक आपदाओं को जन्म देता है, उसी प्रकार शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने से हम बीमार पड़ जाते हैं।

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का ऐतिहासिक प्रचलन:
भारतवर्ष में प्राकृतिक चिकित्सा का प्रचलन आदिकाल से ही रहा है। हमारे ऋषि-मुनि इसे अपनी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग मानते थे। उनका जीवन संयमित और प्राकृतिक नियमों के अनुकूल होता था:

  • वे सात्विक भोजन, व्रत और उपवास का पालन करते थे।
  • वे सप्ताह में एक दिन लवणहीन (नमक रहित) भोजन करते थे।
  • कल्पवास और तीर्थस्थलों का भ्रमण उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।
  • ध्यान, योग और नियमित व्यायाम तथा संयमित जीवनशैली अपनाकर वे दीर्घायु प्राप्त करते थे।

योग और प्राकृतिक चिकित्सा का संबंध (पूरक पद्धतियाँ):
योग और प्राकृतिक चिकित्सा एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि दोनों का अंतिम लक्ष्य तीव्र औषधियों के उपयोग के बिना शरीर को स्वस्थ रखना है।

विशेषतायोग आसनों का योगदानप्राकृतिक चिकित्सा का योगदान
विजातीय तत्वों का निष्कासनशरीर की नाड़ियों में जमा विषैले तत्वों को पिघलाकर मल और मूत्र के माध्यम से बाहर निकालना।एनिमा (Enema) और कुंजल क्रिया जैसी विधियों द्वारा इन तत्वों को बाहर निकालना।
शारीरिक ऊर्जाशरीर में प्राणवायु को बढ़ाना और कार्बन को नियंत्रित करना; शरीर में ऊर्जा पैदा करना और उसे लचीला बनाना।संयमित और संतुलित आहार द्वारा शरीर को पुष्ट (पोषण देना) और स्वस्थ रखना।
समग्र लाभशारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार।शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ।

प्राकृतिक चिकित्सा की प्रमुख विधियाँ:
प्राकृतिक चिकित्सा लोगों के रहन-सहन की आदतों में सकारात्मक बदलाव लाकर उन्हें स्वस्थ रहना सिखाती है। इसकी कई प्रमुख विधियाँ हैं:

  1. आहार चिकित्सा (Diet Therapy)
    यह चिकित्सा पद्धति संतुलित और संयमित आहार पर केंद्रित है। इसमें शामिल हैं:
  • अंकुरित अनाज
  • मौसम अनुसार ताजे फल
  • पत्तेदार सब्जियां

उत्तम स्वास्थ्य के लिए भोजन का अनुपात 20% अम्लीय और 80% क्षारीय होना चाहिए।

2. जल चिकित्सा (Hydrotherapy)
इसमें जल के विभिन्न रूपों का उपयोग उपचार के लिए किया जाता है:

  • स्वच्छ और शीतल जल से स्नान करना।
  • स्वच्छ जल का पर्याप्त सेवन करना।
  • शरीर और आयु के अनुसार जल की निर्धारित मात्रा लेना।

3. मिट्टी चिकित्सा (Mud Therapy)
मिट्टी (पृथ्वी तत्व) में रोगों को दूर करने की अद्भुत क्षमता होती है।

  • इसमें शरीर पर मिट्टी का लेप करना और चोट आदि के उपचार में मिट्टी का प्रयोग शामिल है।
  • मिट्टी में सर्दी और गर्मी (तापमान) को रोकने की शक्ति होती है, जिससे योगीजन इसे शरीर पर लगाते हैं।
  • यह दुर्गंध को रोकती है और त्वचा की सफाई में भी उपयोगी है (महिलाएं बाल धोने में भी इसका प्रयोग करती हैं)।

उदाहरण: घायल हिरण का जल के पास कीचड़ में लेटकर अपनी चोट का उपचार करना, यह दर्शाता है कि जीव-जंतु भी सहज रूप से इस प्राकृतिक विधि का उपयोग करते हैं।

4. सूर्यकिरण चिकित्सा (Heliotherapy)
यह विधि सूर्य के प्रकाश और उसकी किरणों का उपयोग रोगों के उपचार के लिए करती है।

5. मालिश चिकित्सा (Massage Therapy)

इसमें शरीर के विभिन्न अंगों पर विशेष तेलों या पदार्थों से मालिश की जाती है ताकि रक्त संचार सुधरे और विषैले तत्व बाहर निकलें।

6. वायु चिकित्सा (Air Therapy)
इस विधि में शुद्ध और स्वच्छ वायु के सेवन पर ज़ोर दिया जाता है।

  • हम योग आसनों के माध्यम से सही ढंग से श्वास (प्राणवायु) ग्रहण करते हैं, जो हमें जीवन शक्ति प्रदान करती है।
  • प्रदूषित वायु जहाँ बीमारियाँ लाती है, वहीं शुद्ध वायु मनुष्य को स्वस्थ बनाए रखती है।

7. आकाश तत्व चिकित्सा (Fasting/Space Therapy)

यह मुख्य रूप से उपवास पर केंद्रित है, क्योंकि उपवास से पाचन तंत्र को आराम मिलता है।

पाचन क्रिया में उपयोग होने वाली ऊर्जा को शरीर विजातीय तत्वों को बाहर निकालने में लगाता है, जिससे शरीर स्वस्थ होता है।

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