by-Ravindra Sikarwar
ढाका: बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें देश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया गया। यह सजा हसीना की सरकार द्वारा पिछले साल छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर की गई क्रूर कार्रवाई से जुड़ी है, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोगों की जानें गईं। अदालत ने हसीना को अनुपस्थिति में दोषी ठहराया, क्योंकि वह अगस्त 2024 से भारत में निर्वासन में रह रही हैं। इस फैसले ने ढाका की सड़कों पर जश्न का माहौल पैदा कर दिया, जहां लोग राष्ट्रीय ध्वज लहराते हुए न्याय की जीत का उत्सव मना रहे थे।
पृष्ठभूमि: शेख हसीना का राजनीतिक सफर और सत्ता का पतन
शेख हसीना बांग्लादेश की राजनीति की एक प्रमुख हस्ती रही हैं, जिनका जन्म 28 सितंबर 1947 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के तुंगिपाड़ा में हुआ था। वह बांग्लादेश के संस्थापक राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की सबसे बड़ी बेटी हैं। 1975 में एक सैन्य तख्तापलट के दौरान उनके पिता, मां और तीन भाइयों की हत्या कर दी गई, जिसके बाद हसीना और उनकी बहन शेख रेहाना को निर्वासन में जाना पड़ा। 1981 में देश लौटने के बाद उन्होंने अपने पिता की पार्टी अवामी लीग का नेतृत्व संभाला।
हसीना ने 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला, लेकिन उनकी असली सत्ता 2008 के आम चुनावों के बाद मजबूत हुई। 2014 और 2018 के चुनावों में भी अवामी लीग की जीत हुई, जिससे हसीना लगभग 15 वर्षों तक सत्ता में रहीं। उनके शासनकाल में बांग्लादेश ने आर्थिक विकास की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति की—जीडीपी वृद्धि दर औसतन 6-7% रही, गरीबी दर घटी और बुनियादी ढांचे का विस्तार हुआ। हालांकि, इस अवधि में भ्रष्टाचार, लोकतंत्र का क्षय, प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगे। विपक्षी दलों पर दमन की नीतियां और चुनावों में कथित धांधली ने उनके खिलाफ असंतोष को बढ़ावा दिया।
2024 का जुलाई विद्रोह: हिंसा का चरम बिंदु
सबसे बड़ा संकट जुलाई 2024 में आया, जब छात्र संगठनों ने सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण को लेकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरू किए। यह आरक्षण स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गजों के वंशजों के लिए था, जिसे छात्र असमान मानते थे। शुरू में शांतिपूर्ण रहा यह आंदोलन जल्द ही बड़े पैमाने पर जन-आंदोलन में बदल गया, जिसमें युवा, मजदूर और मध्यम वर्ग शामिल हो गए। हसीना सरकार ने इसे दबाने के लिए सुरक्षा बलों का कठोर प्रयोग किया—रबर बुलेट्स, आंसू गैस और अंततः असली गोलियों का इस्तेमाल।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15 जुलाई से 5 अगस्त 2024 के बीच हुई हिंसा में करीब 1,400 लोग मारे गए, जबकि हजारों घायल हुए। अधिकांश मौतें सुरक्षा बलों की गोलीबारी से हुईं। आंदोलनकारियों के अनुसार, सरकार ने इंटरनेट ब्लैकआउट, गिरफ्तारियां और यहां तक कि नाबालिगों पर भी बल प्रयोग किया। यह बांग्लादेश के 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद की सबसे घातक हिंसा थी। आखिरकार, 5 अगस्त 2024 को हसीना को सत्ता से भागना पड़ा। सेना के हस्तक्षेप के बाद अंतरिम सरकार बनी, जिसका नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने संभाला। हसीना भारत चली गईं, जहां वे अभी भी रह रही हैं।
मुकदमा: आरोप, सुनवाई और फैसला
मुकदमा अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल-1 (आईसीटी-1) में चला, जो बांग्लादेश का घरेलू युद्ध-अपराध न्यायालय है। हसीना पर मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप लगाए गए, जिसमें हत्या, विद्रोहियों पर घातक हथियारों का आदेश देना, उकसावा और दंडात्मक कार्रवाई न करना शामिल था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि हसीना ने सीधे तौर पर सुरक्षा बलों को हिंसा का आदेश दिया। मुकदमे में दो अन्य आरोपी भी थे: पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल, जिन्हें भी मृत्युदंड मिला, और पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामून, जो राज्य साक्षी बन गए और उन्हें केवल पांच वर्ष की सजा सुनाई गई।
सुनवाई कई महीनों चली। हसीना ने अदालत के सम्मन का पालन नहीं किया और राज्य-नियुक्त वकील के माध्यम से बचाव किया। उनके वकील ने आरोपों को आधारहीन बताते हुए बरी करने की मांग की। 17 नवंबर को ढाका के एक सुरक्षित अदालत कक्ष में तीन जजों की बेंच ने फैसला सुनाया। एक जज ने कहा, “शेख हसीना ने उकसावे, आदेश और दंड न देने के माध्यम से मानवता के खिलाफ अपराध किए।” फैसले के बाद अदालत में तालियां और नारे गूंजे। पीड़ित परिवारों के सदस्य रो पड़े, जबकि बाहर सड़कों पर लोग जश्न मना रहे थे। एक पीड़ित के पिता मोहम्मद अबु बकर शिकदर ने कहा, “हसीना को भारत से लाकर बांग्लादेशी मिट्टी पर ही सजा दी जानी चाहिए।”
प्रतिक्रियाएं: जश्न, विवाद और भविष्य की चुनौतियां
फैसले पर अंतरिम सरकार ने इसे “शहीदों और देशभक्तों की जीत” करार दिया। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी जैसे विपक्षी दलों ने इसे ऐतिहासिक बताया। हालांकि, हसीना के बेटे और सलाहकार साजिद वाजेद ने फैसले को अपील करने से इनकार कर दिया, जब तक कि अवामी लीग के साथ एक लोकतांत्रिक सरकार न बने। हसीना ने एक बयान में फैसले को “पूर्वाग्रही और राजनीतिक रूप से प्रेरित” कहा। उन्होंने दावा किया कि ट्रिब्यूनल “गैर-चुनावी सरकार” द्वारा स्थापित है और उन्होंने केवल “अराजकता को नियंत्रित करने के अच्छे विश्वास” में कार्रवाई की थी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत ने चुप्पी साध रखी है, क्योंकि हसीना उनकी करीबी सहयोगी रहीं। बांग्लादेश सरकार ने कहा कि वे सभी कानूनी उपाय अपनाएंगे ताकि हसीना को प्रत्यर्पित किया जा सके। फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है। ढाका में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, और छिटपुट हिंसा की घटनाएं भी रिपोर्ट की गई हैं।
यह फैसला बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में एक मोड़ साबित हो सकता है। एक ओर यह न्याय की मांग को पूरा करता है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक ध्रुवीकरण को और गहरा कर सकता है। देश अब स्थिरता और लोकतांत्रिक चुनावों की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हसीना के समर्थकों और आलोचकों के बीच तनाव बना रहेगा।
