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by-Ravindra Sikarwar

स्वच्छता में लगातार सात बार नंबर-1 रहने वाले इंदौर ने अब अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी अपना परचम लहराया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर ने भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक क्रांतिकारी क्रायोजेनिक ऑप्टिकल फाइबर सेंसर विकसित किया है, जो -270 डिग्री सेल्सियस तक के अत्यंत कम तापमान में भी पूरी सटीकता के साथ काम कर सकता है। इस उपलब्धि से आईआईटी इंदौर अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का मजबूत सहयोगी बनने जा रहा है।

किन क्षेत्रों में होगा उपयोग:
यह नया सेंसर सिर्फ अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। इसके कई व्यावहारिक उपयोग हैं:

  • एलएनजी पाइपलाइनों में -180 डिग्री सेल्सियस तक तापमान की रियल-टाइम निगरानी 
  • पाइपलाइन में रिसाव, फ्लो रेट और तरल स्तर का पता लगाना 
  • रॉकेट और प्रक्षेपण यानों के क्रायोजेनिक उपकरणों के तापीय स्वास्थ्य की जांच 
  • अंतरिक्ष यानों के ईंधन टैंकों में तापमान और द्रव स्तर का सटीक मापन 

पारंपरिक सेंसर क्यों हो जाते थे फेल?
हीलियम, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन जैसे क्रायोजेनिक तरल पदार्थों के पास बहुत कम तापमान होता है। सामान्य ऑप्टिकल फाइबर सेंसर -150 डिग्री सेल्सियस से नीचे अपनी संवेदनशीलता खो देते हैं और इलेक्ट्रॉनिक सेंसर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हस्तक्षेप से प्रभावित हो जाते हैं। नतीजतन, अंतरिक्ष यानों के ईंधन टैंकों में सटीक मापन करना बेहद मुश्किल हो जाता था।

समाधान: शेप मेमोरी एलॉय (SMA) कोटिंग
आईआईटी इंदौर की टीम ने इस समस्या का अनोखा हल निकाला। उन्होंने ऑप्टिकल फाइबर पर शेप मेमोरी एलॉय (SMA) की विशेष कोटिंग चढ़ाई। यह मेटल एलॉय अत्यंत कम और अत्यंत उच्च तापमान दोनों में स्थिर रहता है। तापमान बदलने पर SMA में फेज परिवर्तन होता है, जिससे फाइबर में गुजरने वाले प्रकाश सिग्नल में बड़ा बदलाव आता है। इससे सेंसर की संवेदनशीलता कई गुना बढ़ जाती है और -270 डिग्री सेल्सियस पर भी यह पूरी तरह काम करता है।

सेंसर की प्रमुख विशेषताएं:

  • -270 डिग्री सेल्सियस तक पूरी तरह विश्वसनीय 
  • अत्यधिक कम तापमान पर भी तेज और सटीक ऑप्टिकल प्रतिक्रिया 
  • मौजूदा मेटल-कोटेड फाइबर सेंसर से कहीं बेहतर प्रदर्शन 
  • हल्का वजन, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त 
  • सामान्य दूरसंचार फाइबर से कई गुना ज्यादा संवेदनशील 

इसरो के साथ सीधा सहयोग:
यह परियोजना इसरो के लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम सेंटर (LPSC) के RESPOND प्रोग्राम के तहत पूरी की गई है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की ‘मेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंटेशन लैब’ में प्रो. आई. ए. पलानी और डॉ. नंदिनी पात्रा के नेतृत्व में शोध दल ने इसे विकसित किया है। इस तकनीक पर तीन संयुक्त पेटेंट दाखिल करने की प्रक्रिया चल रही है।

आईआईटी इंदौर निदेशक का बयान:
आईआईटी इंदौर के निदेशक प्रो. सुहास जोशी ने कहा, “यह नवाचार हमारी तकनीकी प्रतिबद्धता और स्वदेशी अंतरिक्ष कार्यक्रम में योगदान का प्रमाण है। यह सेंसर इसरो के भावी मिशनों को और सुरक्षित व विश्वसनीय बनाएगा।”

प्रो. पलानी ने बताया कि अंतरिक्ष यान के क्रायोजेनिक ईंधन टैंकों में सटीक मापन अब तक सबसे बड़ी चुनौती थी। हमारा सेंसर इस चुनौती को हमेशा के लिए खत्म कर देगा।

इंदौर एक बार फिर साबित कर रहा है कि स्वच्छता के साथ-साथ वह तकनीकी नवाचार और अंतरिक्ष विज्ञान में भी देश का गौरव बढ़ा सकता है।

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