by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: एक चौंकाने वाली नई रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि दुनिया भर में होने वाली छात्र आत्महत्याओं में से हर नौ में से एक भारत में होती है। आईसी3 इंस्टीट्यूट की ताजा रिपोर्ट ‘स्टूडेंट सुसाइड्स: एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया’ (वॉल्यूम 2) के अनुसार, भारत में छात्रों की आत्महत्या की दर न केवल राष्ट्रीय औसत से दोगुनी है, बल्कि जनसंख्या वृद्धि दर को भी पीछे छोड़ चुकी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2023 के आंकड़ों में यह संख्या 13,892 तक पहुंच गई, जो पिछले दस वर्षों में सबसे अधिक है। यह आंकड़े स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य संकट की गहराई को उजागर करते हैं, जहां अकादमिक दबाव, माता-पिता की उम्मीदें और काउंसलिंग की कमी युवा जीवन को लील रही है।
पिछले दशक में 65% की भयावह वृद्धि:
एनसीआरबी की रिपोर्ट्स के अनुसार:
- 2013 से 2022 तक छात्र आत्महत्याएं 6,654 से बढ़कर 13,044 हो गईं, यानी 99% पुरुष और 92% महिला छात्रों में वृद्धि।
- 2023 में कुल 1,71,418 आत्महत्याओं में से 8.1% (13,892) छात्र थे – हर दिन औसतन 38 छात्रों ने जान दी।
- 2013-2023 के बीच कुल 1,17,849 छात्र आत्महत्या के शिकार हुए।
- पिछले दशक में छात्र आत्महत्याओं की वार्षिक वृद्धि दर 4% रही, जबकि कुल आत्महत्याओं की 2% और 0-24 आयु वर्ग की जनसंख्या में कमी आई।
विश्व स्तर पर, भारत की युवा आबादी (15-29 वर्ष) दुनिया की सबसे बड़ी है, लेकिन यहां आत्महत्या की दर भी सबसे अधिक। आईसी3 रिपोर्ट के संस्थापक गणेश कोहली कहते हैं, “यह सिर्फ परीक्षा या मार्क्स का मामला नहीं, बल्कि डर, चुप्पी और भावनात्मक समर्थन की कमी की गहरी सांस्कृतिक समस्या है।”
राज्यवार आंकड़े: पांच राज्य आधे मामलों के जिम्मेदार
2022-2023 के आंकड़ों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और झारखंड कुल छात्र आत्महत्याओं के 49% के लिए जिम्मेदार:
- महाराष्ट्र: 1,834 (2021) से बढ़कर सबसे अधिक।
- मध्य प्रदेश: 1,308-1,340।
- तमिलनाडु: 1,246-1,416।
- उत्तर प्रदेश: 1,060 (नई एंट्री, रिपोर्टिंग में सुधार)।
- झारखंड: 824।
दक्षिणी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश कुल 29% मामलों के लिए जिम्मेदार। कोटा (राजस्थान) जैसे कोचिंग हब में 2023 में 29 मामले दर्ज हुए।
मुख्य कारण: दबाव का दोहरा हमला
- अकादमिक तनाव: परीक्षा फेलियर से 2,248 मामले (2022), कोचिंग सेंटर्स में प्रतिस्पर्धा।
- पारिवारिक और सामाजिक दबाव: रिश्तों की समस्या, bullying, रैगिंग।
- मानसिक स्वास्थ्य: डिप्रेशन, एंग्जायटी; 87% मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी।
- लिंग अंतर: 2021-2022 में पुरुष छात्रों में 6% कमी, लेकिन महिला छात्रों में 7% वृद्धि।
- अन्य: बेरोजगारी, आर्थिक संकट, सोशल मीडिया तुलना।
एनसीआरबी डेटा में अंडर-रिपोर्टिंग 37% तक है, क्योंकि आत्महत्या को अभी भी अपराध माना जाता है (आईपीसी सेक्शन 309)।
वैश्विक तुलना: भारत का बोझ सबसे भारी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में आत्महत्या दर में सबसे ऊपर है। युवा आत्महत्याओं में भारत का योगदान 25-36% तक। आईसी3 टास्क फोर्स के चेयर हरीश मेनन कहते हैं, “विश्व में किशोरों की मौत का नंबर-1 कारण सड़क दुर्घटना है, लेकिन भारत में आत्महत्या।”
सरकारी प्रयास और सुझाव:
- राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (2022): परीक्षा तनाव कम करने के लिए सप्लीमेंट्री एग्जाम।
- मनोदर्पण और टेली-मानस: हेल्पलाइन सेवाएं।
- गेटकीपर ट्रेनिंग: शिक्षकों- अभिभावकों को संकेत पहचानने की ट्रेनिंग।
विशेषज्ञों की सलाह:
- हर स्कूल में काउंसलर अनिवार्य।
- शिक्षकों को पहला काउंसलर बनाएं।
- सस्ते प्रोग्राम जैसे एverting स्टूडेंट सुसाइड टास्क फोर्स।
- परीक्षा को जीवन-मृत्यु न बनाएं, प्लान बी सिखाएं।
बचाव के उपाय: तुरंत करें ये
- N95 मास्क की तरह मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
- हेल्पलाइन: 104, 9152987821 (टेली-मानस)।
- अभिभावक: बच्चे की भावनाओं को सुनें, मार्क्स से ऊपर जीवन।
- स्कूल: एंटी-रैगिंग सेल, मेंटल हेल्थ वर्कशॉप।
- छात्र: तनाव में दोस्त या काउंसलर से बात करें।
यह संकट सिर्फ आंकड़े नहीं, लाखों परिवारों की त्रासदी है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि बिना तत्काल कदम के यह महामारी और बढ़ेगी। सरकार, स्कूल और समाज को मिलकर ‘कल्चरल रीसेट’ करना होगा – शिक्षा को बोझ नहीं, खुशी का माध्यम बनाना होगा।
