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by-Ravindra Sikarwar

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने और रक्षा-तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों से लेकर गुजरात के शोध संस्थानों तक, कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं चल रही हैं। साथ ही, नागरिक उड्डयन क्षेत्र में स्वदेशी यात्री विमान विकसित करने का पुराना सपना अभी भी अधर में लटका हुआ है। आइए इन तीनों मुद्दों पर विस्तार से नजर डालते हैं।

लद्दाख में मेगा सोलर पावर प्रोजेक्ट:
लद्दाख के लेह जिले में भारत सरकार 1,000 मेगावॉट (1 गीगावॉट) क्षमता वाला एक अत्याधुनिक सोलर पावर प्लांट विकसित कर रही है। यह परियोजना नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और भारतीय सेना के सहयोग से चल रही है, क्योंकि यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

  • विशेषताएं:

  – उच्च ऊंचाई (लगभग 3,000 मीटर) पर सूर्य की किरणें अधिक तीव्र होती हैं, जिससे पैनल की दक्षता 20-25% तक बढ़ जाती है।

  – ठंडे तापमान के कारण सोलर सेल्स का प्रदर्शन बेहतर रहता है।

  – बैटरी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के साथ हाइब्रिड मॉडल, जो रात में भी बिजली सप्लाई सुनिश्चित करेगा।

  • लाभ:

  – लद्दाख में डीजल जेनरेटर पर निर्भरता कम होगी, जिससे प्रतिवर्ष लगभग 1.2 लाख लीटर डीजल की बचत होगी।

  – कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी।

  – स्थानीय लोगों को रोजगार और स्किल डेवलपमेंट के अवसर मिलेंगे।

परियोजना का पहला चरण 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है। इसे SECI (सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) द्वारा टेंडर किया गया है और अडाणी ग्रीन व टाटा पावर जैसी कंपनियां इसमें हिस्सा ले रही हैं।

भारतीय सेना और IIT गांधीनगर का ऐतिहासिक MoU
6 नवंबर 2025 को भारतीय थल सेना और IIT गांधीनगर के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए। इसका उद्देश्य रक्षा तकनीक में नवाचार को बढ़ावा देना है।

  • मुख्य क्षेत्र:

  – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित ड्रोन और स्वायत्त वाहन।

  – क्वांटम सेंसर और साइबर सिक्योरिटी सॉल्यूशंस।

  – एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (3D प्रिंटिंग) से हल्के हथियार और स्पेयर पार्ट्स का उत्पादन।

  – ग्रीन एनर्जी में सैन्य ठिकानों के लिए माइक्रो-ग्रिड सिस्टम।

  • संरचना:

  – IIT गांधीनगर में एक डेडिकेटेड डिफेंस इनोवेशन लैब स्थापित की जाएगी।

  – सेना के अधिकारी IIT में शॉर्ट-टर्म कोर्स करेंगे।

  – संयुक्त पेटेंट और स्टार्टअप इन्क्यूबेशन को प्रोत्साहन।

यह MoU आत्मनिर्भर भारत और iDEX (इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस) पहल का हिस्सा है। इससे न केवल सेना की युद्धक क्षमता बढ़ेगी, बल्कि नागरिक क्षेत्र में भी तकनीकी ट्रांसफर होगा।

स्वदेशी यात्री विमान का सपना: अब भी क्यों अधूरा?
भारत ने 1980 के दशक में SARAS और NAL Hansa जैसे छोटे विमान बनाए, लेकिन 70-100 सीटों वाला मध्यम आकार का यात्री विमान अभी तक नहीं बना सका। BBC हिंदी की एक हालिया रिपोर्ट में इसकी प्रमुख वजहें बताई गई हैं:

  1. फंडिंग की कमी:

   – HAL और NAL को हर साल सिर्फ ₹200-300 करोड़ मिलते हैं, जबकि बोइंग या एयरबस अरबों डॉलर खर्च करते हैं।

  1. इंजन तकनीक पर निर्भरता:

   – भारत के पास अभी तक हाई-बाइपास टर्बोफैन इंजन बनाने की क्षमता नहीं है। GE और Pratt & Whitney पर निर्भरता बनी हुई है।

  1. सर्टिफिकेशन की जटिलता:

   – DGCA और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों (FAA, EASA) से सर्टिफिकेशन में 7-10 साल लग जाते हैं।

  1. मार्केट रिस्क:

   – इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी एयरलाइंस बोइंग-एयरबस को प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स आसान हैं।

वर्तमान प्रयास:

  • Regional Transport Aircraft (RTA) प्रोजेक्ट: 90-सीटर विमान, जिसे HAL और NAL मिलकर बना रहे हैं। पहली उड़ान 2028-29 में संभावित।
  • DRDO का सहयोग: हल्के कंपोजिट मटेरियल और फ्लाई-बाय-वायर तकनीक में मदद।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और महिंद्रा एयरोस्पेस इसमें शामिल हो रहे हैं।

लद्दाख का सोलर प्लांट और IIT-सेना का MoU भारत की तकनीकी क्षमता और हरित ऊर्जा प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं। लेकिन स्वदेशी यात्री विमान का सपना पूरा करने के लिए निरंतर फंडिंग, इंजन डेवलपमेंट, और निजी-सरकारी साझेदारी की जरूरत है। अगर ये बाधाएं दूर हुईं, तो 2030 तक भारतीय आकाश में “मेक इन इंडिया” विमान उड़ते दिख सकते हैं।

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