by-Ravindra Sikarwar
भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह की प्रथा को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने 5 नवंबर 2025 को एक ऐतिहासिक अधिसूचना जारी की है। इस नई नीति के अनुसार, कोई भी मुस्लिम पुरुष अब अपनी पहली पत्नी की स्पष्ट लिखित सहमति के बिना दूसरा विवाह कानूनी रूप से दर्ज नहीं करा सकेगा। यह नियम मुस्लिम मैरिज रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पर लागू होगा, जो मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत संचालित होता है। यदि पहली पत्नी सहमति देने से इनकार करती है, तो दूसरा विवाह रजिस्ट्रार द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा, और इसे कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी। उल्लंघन करने वालों पर 50,000 रुपये तक का जुर्माना, 6 महीने की कैद या दोनों सजा हो सकती है। यह कदम महिला सशक्तिकरण, पारिवारिक स्थिरता और लिंग समानता को बढ़ावा देने की दिशा में उठाया गया है, जो लंबे समय से चली आ रही सामाजिक और कानूनी बहस का परिणाम है।
नीति की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ:
भारत में मुस्लिम समुदाय के लिए बहुविवाह की अनुमति कुरान की आयत 4:3 पर आधारित है, जो चार विवाह तक की छूट देती है, बशर्ते सभी पत्नियों के साथ न्याय हो। हालांकि, स्वतंत्रता के बाद से यह प्रथा विवादों में रही है। 1955 में हिंदू मैरिज एक्ट ने हिंदुओं के लिए एकपत्नीत्व अनिवार्य कर दिया, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ को छूट दी गई। 1985 के शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया, जिसके बाद मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट, 1986 बना, लेकिन बहुविवाह पर कोई सीधी पाबंदी नहीं लगी।
2017 में ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित करने के बाद महिला संगठनों ने बहुविवाह पर भी रोक की मांग तेज कर दी। 2018 में लॉ कमीशन की 247वीं रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि सभी धर्मों में एकसमान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू हो, जिसमें बहुविवाह पर रोक हो। 2024 में उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाने का फैसला किया। वर्तमान नीति इसी क्रम की अगली कड़ी है, जो मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक सुरक्षा को प्राथमिकता देती है।
नए नियम का विस्तृत विवरण:
नई अधिसूचना गृह मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय के संयुक्त परामर्श से तैयार की गई है। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:
- सहमति फॉर्म अनिवार्य: दूसरी शादी के लिए आवेदन करते समय पुरुष को पहली पत्नी का नोटरीकृत सहमति पत्र जमा करना होगा। इसमें पत्नी को स्पष्ट रूप से लिखना होगा कि वह दूसरी शादी से सहमत है और उसे कोई आपत्ति नहीं है।
- सहमति की शर्तें:
- सहमति स्वेच्छा से होनी चाहिए; दबाव, धमकी या आर्थिक प्रलोभन के प्रमाण मिलने पर अमान्य होगी।
- पहली पत्नी को 30 दिन का विचार समय दिया जाएगा।
- यदि पहली पत्नी नाबालिग, मानसिक रूप से अस्वस्थ या अनुपस्थित है, तो कोर्ट की अनुमति जरूरी होगी।
- रजिस्ट्रार की जिम्मेदारी:
- काजी या रजिस्ट्रार को सहमति पत्र की जांच करनी होगी।
- बिना सहमति के पंजीकरण करने पर रजिस्ट्रार पर 1 लाख रुपये जुर्माना और लाइसेंस रद्द की कार्रवाई होगी।
- कानूनी परिणाम:
- बिना पंजीकरण के किया गया दूसरा विवाह अमान्य माना जाएगा।
- दूसरी पत्नी को गुजारा भत्ता, संपत्ति में हिस्सा या वारिसी का अधिकार नहीं मिलेगा।
- बच्चे वैध माने जाएंगे, लेकिन पिता की संपत्ति में हिस्सा केवल पहली पत्नी के बच्चों को प्राथमिकता मिलेगी।
- अपील का अधिकार:
- पहली पत्नी सहमति देने से इनकार करे तो पुरुष फैमिली कोर्ट में अपील कर सकता है, लेकिन उसे साबित करना होगा कि दूसरी शादी “धार्मिक और सामाजिक जरूरत” है।
महिला संगठनों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया:
- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इसे “धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला” बताया और सुप्रीम कोर्ट जाने की धमकी दी।
- भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) की फाउंडर जाकिया सोमन ने स्वागत किया: “यह पहला कदम है। अब हमें गुजारा भत्ता और संपत्ति में बराबर हिस्सा भी चाहिए।”
- वरिष्ठ वकील फ्लाविया एग्नेस ने कहा: “यह व्यावहारिक कदम है, लेकिन कोर्ट में दबाव की चुनौती बनी रहेगी।”
- सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने ट्वीट किया: “अब मुस्लिम महिलाएं अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो रही हैं। यह बदलाव की शुरुआत है।”
सामाजिक और कानूनी प्रभाव:
- महिलाओं की सुरक्षा: पहली पत्नी को अब आर्थिक और भावनात्मक शोषण से बचाने का कानूनी हथियार मिलेगा। कई मामले सामने आए हैं जहां पुरुष बिना बताए दूसरी शादी कर लेते थे और पहली पत्नी को घर से निकाल देते थे।
- बच्चों का भविष्य: दूसरी शादी के बच्चों को वैधता तो मिलेगी, लेकिन संपत्ति में हिस्सा सीमित होने से पारिवारिक विवाद कम होंगे।
- धार्मिक समुदायों पर दबाव: मौलाना और काजी अब सहमति की जांच करेंगे, जिससे उनकी भूमिका पारदर्शी होगी।
- राजनीतिक बहस: भाजपा ने इसे “महिला सशक्तिकरण” बताया, जबकि विपक्ष ने “धार्मिक हस्तक्षेप” करार दिया।
कार्यान्वयन की चुनौतियां:
- ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी: कई महिलाएं सहमति पत्र के बारे में नहीं जानती होंगी।
- दबाव और धमकी के मामले: परिवार या समाज का दबाव सहमति को मजबूर कर सकता है।
- कोर्ट में मुकदमों की बाढ़: अपील के मामले बढ़ सकते हैं।
- निकाहनामा में बदलाव: अब निकाहनामा में “सहमति क्लॉज” जोड़ा जाएगा।
भविष्य की संभावनाएं:
सरकार ने संकेत दिया है कि यह नीति यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की दिशा में पहला कदम है। अगले चरण में:
- सभी धर्मों में एकपत्नीत्व अनिवार्य करना,
- गुजारा भत्ता और संपत्ति में बराबर हिस्सा,
- अंतर-धार्मिक विवाहों के लिए एकसमान नियम।
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियम सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का सामना करेगा, लेकिन शायरा बानो केस (2017) और ट्रिपल तलाक बैन की तरह इसे भी संवैधानिक मान्यता मिलने की संभावना है।
यह नया नियम मुस्लिम महिलाओं के लिए एक मजबूत कवच साबित हो सकता है, जो सदियों से चली आ रही असमानता को चुनौती देता है। यह न केवल कानूनी सुधार है, बल्कि सामाजिक चेतना का भी प्रतीक है कि विवाह एकतरफा अधिकार नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और सहमति का बंधन है। सरकार ने हेल्पलाइन 181 और वकील सहायता केंद्रों के जरिए जागरूकता अभियान शुरू किया है, ताकि हर महिला अपने अधिकार जान सके। यह बदलाव बताता है कि धार्मिक परंपराएं भी समय के साथ आधुनिक मूल्यों के साथ तालमेल बिठा सकती हैं—बशर्ते इच्छाशक्ति हो।
