by-Ravindra Sikarwar
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 4 नवंबर 2025 को मल्टीप्लेक्स थिएटर्स में फिल्म टिकटों के साथ-साथ खाद्य पदार्थों और पेयों की अत्यधिक ऊंची कीमतों को लेकर गहरी नाराजगी जाहिर की। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यदि ये दरें तुरंत सुधारी नहीं गईं, तो सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या घटकर शून्य हो जाएगी। यह टिप्पणी कर्नाटक सरकार के मल्टीप्लेक्स टिकटों पर 200 रुपये की सीमा लगाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर हो रही बहस के बीच आई। कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के कुछ शर्तों को स्थगित करते हुए नोटिस जारी किया, लेकिन मूल मुद्दे पर साफ चेतावनी दी कि मनोरंजन उद्योग को सस्ता और सुलभ बनाना जरूरी है। यह मामला न केवल उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि सिनेमा क्षेत्र की गिरती लोकप्रियता और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से बढ़ती प्रतिस्पर्धा को भी रेखांकित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि और कर्नाटक सरकार का फैसला:
कर्नाटक सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी कर मल्टीप्लेक्सों में फिल्म टिकटों की अधिकतम कीमत 200 रुपये तय कर दी थी। इसका उद्देश्य आम दर्शकों, खासकर मध्यम वर्गीय परिवारों को महंगे टिकटों से राहत देना था। इस फैसले को चुनौती देते हुए ‘मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ और अन्य पक्षकारों ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी, लेकिन कुछ सख्त शर्तें लगाईं—जैसे कि हर टिकट की बिक्री का ऑडिटेबल रिकॉर्ड रखना, ऑनलाइन और ऑफलाइन खरीदारों की पहचान ट्रैक करना, और यदि राज्य सरकार की जीत हुई तो रिफंड की व्यवस्था सुनिश्चित करना। इन शर्तों में कैश से टिकट खरीदने वालों के आईडी कार्ड विवरण दर्ज करने का प्रावधान भी था, जो एसोसिएशन ने ‘असंभव’ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, बेंच ने न केवल टिकट कीमतों पर बल्कि थिएटरों में बिकने वाले स्नैक्स, पॉपकॉर्न, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य आइटम्स की ऊंची दरों पर भी फोकस किया। जस्टिस नाथ ने मौखिक टिप्पणी में कहा, “आप पानी की बोतल के लिए 100 रुपये वसूलते हैं, कॉफी के लिए 700 रुपये—यह क्या तुक है? सिनेमा पहले से ही संकट में है, इसे और महंगा बनाकर दर्शकों को भगाओगे तो हॉल खाली पड़े रहेंगे।” कोर्ट का मत था कि मनोरंजन एक आवश्यक सेवा है, और इसकी कीमतें ऐसी होनी चाहिए जो आम जनता के बजट में फिट हों।
सुनवाई के दौरान प्रमुख बहस और तर्क:
सुनवाई में मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने किया। उन्होंने हाईकोर्ट की शर्तों को अव्यावहारिक बताते हुए कहा, “टिकट बुकमाईशो जैसे ऐप्स से खरीदे जाते हैं, काउंटर पर कौन जाता है? कैश टिकट के लिए आईडी डिटेल्स रखना नामुमकिन है—लोग थिएटर में आईडी क्यों ले जाते हैं?” रोहतगी ने आगे तर्क दिया कि कॉफी जैसी चीजों की कीमतें बाजार दरों पर निर्भर हैं, और ताज होटल जैसे प्रतिष्ठान 1000 रुपये भी वसूलते हैं—क्या सरकार वहां भी नियंत्रण लगाएगी?
दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार के वकील ने सफाई दी कि हाईकोर्ट की शर्तें अस्थायी हैं, ताकि यदि राज्य का फैसला अंतिम रूप से लागू हुआ तो उपभोक्ताओं को रिफंड मिल सके। उन्होंने कहा, “यदि आज आप 1000 रुपये देते हैं और कल राज्य जीत गया, तो 800 रुपये वापस मिल जाएंगे।” जस्टिस नाथ ने इस पर असहमति जताई और जोर दिया कि समस्या मूल रूप से कीमतों की है, न कि रिफंड की। कोर्ट ने याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए हाईकोर्ट की शर्तों को फिलहाल स्थगित कर दिया, लेकिन मूल मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय की।
यह बहस सुप्रीम कोर्ट की पुरानी टिप्पणियों से जुड़ती है, जहां कोर्ट ने पहले भी हवाई अड्डों और सिनेमाघरों में ऊंची कीमतों पर सवाल उठाए थे। उदाहरण के लिए, 2023 में कोर्ट ने हवाई अड्डों पर पानी की बोतल के लिए 30 रुपये से अधिक वसूलने पर रोक लगाई थी, लेकिन मल्टीप्लेक्स क्षेत्र में यह पहली बार इतनी स्पष्ट चेतावनी है।
मल्टीप्लेक्सों में ऊंची कीमतों का प्रभाव और आंकड़े:
मल्टीप्लेक्स उद्योग में खाद्य पदार्थों की कीमतें टिकटों से कई गुना अधिक हैं, जो दर्शकों के लिए बोझ बन गई हैं। एक सामान्य मूवी आउटिंग का खर्चा प्रति व्यक्ति औसतन 1800 रुपये तक पहुंच जाता है—जिसमें टिकट 400-1200 रुपये, पॉपकॉर्न का छोटा पैकेट 500 रुपये से ऊपर, कारमेल या चीज फ्लेवर जोड़ने पर 700 रुपये, और कोल्ड ड्रिंक 50 रुपये वाली बाहर की बोतल थिएटर में 400 रुपये प्लस टैक्स में बिकती है। आधा लीटर पानी की बोतल भी 100 रुपये की पड़ती है।
कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) के 2023 के एक उपभोक्ता सर्वे के अनुसार, महामारी के बाद मल्टीप्लेक्सों में फुटफॉल 15% घट गया है, क्योंकि मध्यम वर्ग के परिवार अब घर पर ओटीटी देखना पसंद कर रहे हैं। फिल्ममेकर करण जौहर ने पिछले साल कहा था कि चार लोगों का मूवी आउटिंग अब 10,000 रुपये का खर्चा आता है। सोशल मीडिया पर भी शिकायतों की बाढ़ आ गई है—लोग वायरल पोस्ट शेयर कर रहे हैं कि थिएटर अब ‘फूड और हॉस्पिटैलिटी बिजनेस’ ज्यादा लगते हैं, न कि सिनेमा का। एक यूजर ने लिखा, “बाहर खाना लाने की इजाजत दें, तो कीमतें खुद कम हो जाएंगी।”
विशेषज्ञों का कहना है कि मल्टीप्लेक्स चेन जैसे पीवीआर, आईनॉक्स और सिनेपॉलीस अपनी कमाई का 40-50% स्नैक्स से कमाते हैं, जो टिकटों से कहीं अधिक लाभदायक है। लेकिन यह रणनीति उल्टी पड़ रही है, क्योंकि दर्शक अब सस्ते विकल्प चुन रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के निहितार्थ और संभावित परिणाम:
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत मिसलीडिंग प्राइसिंग के खिलाफ एक मजबूत संकेत है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि कीमतें ‘उचित और निश्चित’ होनी चाहिए, ताकि सिनेमा का आनंद सभी को मिले। यदि मल्टीप्लेक्स इस पर अमल नहीं करते, तो सरकारें अन्य राज्यों में भी टिकट कैपिंग जैसे कदम उठा सकती हैं। उद्योग संगठनों ने चिंता जताई है कि इससे निवेश प्रभावित होगा, लेकिन कोर्ट का रुख साफ है—लाभ कमाने का हक है, लेकिन उपभोक्ता को लूटने का नहीं।
यह मामला सिनेमाई उद्योग के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम पहले से ही सस्ते सब्सक्रिप्शन मॉडल से दर्शकों को आकर्षित कर रहे हैं। यदि थिएटर कीमतें नहीं सुधरीं, तो बॉक्स ऑफिस कलेक्शन और भी गिर सकते हैं। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि मल्टीप्लेक्स को फ्लेक्सिबल प्राइसिंग अपनानी चाहिए—जैसे सुबह के शो सस्ते, या फैमिली पैकेज।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं तेज हैं। एक यूजर ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट सही कह रहा है—सिनेमा मर रहा है, इसे बचाओ।” एक अन्य ने लिखा, “हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर खारिज हो, 200 रुपये कैप जरूरी है।” यह बहस न केवल कर्नाटक तक सीमित है, बल्कि पूरे देश के मल्टीप्लेक्सों के लिए एक सबक है।
सुप्रीम कोर्ट की यह पहल उपभोक्ताओं के लिए राहत की उम्मीद जगाती है, जो लंबे समय से महंगाई से जूझ रहे हैं। यदि दरें नियंत्रित हुईं, तो सिनेमा फिर से परिवारों का पसंदीदा विकल्प बन सकता है, अन्यथा थिएटर हॉल वाकई खाली पड़े नजर आएंगे।
