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By: Ravindra Sikarwar

सीहोर जिले में स्थित वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (वीआईटी) भोपाल परिसर में पिछले कई महीनों से 15 हजार से अधिक छात्रों को घटिया और अस्वच्छ भोजन परोसा जा रहा था। खराब गुणवत्ता वाला खाना और दूषित पेयजल के कारण नवंबर महीने में ही 23 छात्र और 12 छात्राएं पीलिया की चपेट में आ चुके थे। कई अन्य छात्रों को उल्टी, दस्त और पेट दर्द की लगातार शिकायत रहती थी। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रबंधन ने न तो मेस ठेकेदारों पर कोई कार्रवाई की और न ही चिकित्सा सुविधाएं दुरुस्त कीं। छात्रों की लगातार शिकायतों को दबाने के लिए डर और धमकी का सहारा लिया जाता रहा।

25 नवंबर की रात यही दबी हुई नाराजगी आग की तरह भड़क उठी। सैकड़ों छात्र सड़कों पर उतरे, नारेबाजी की और परिसर में तोड़फोड़ की। घटना इतनी गंभीर हो गई कि रात दो बजे पुलिस को बुलाना पड़ा। इसके बाद मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग ने तुरंत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति ने परिसर का गहन निरीक्षण किया, छात्रों-छात्राओं से अलग-अलग बातचीत की और मेडिकल रिकॉर्ड खंगाले। सोमवार को समिति ने अपनी रिपोर्ट उच्च शिक्षा विभाग को सौंप दी, जिसमें प्रबंधन की घोर लापरवाही और तानाशाही रवैये को बेपर्द किया गया है।

रिपोर्ट में साफ लिखा है कि विश्वविद्यालय परिसर किसी तानाशाह के किले से कम नहीं है। चारदीवारी के अंदर प्रबंधन के अपने नियम चलते हैं। छात्रों में भय का माहौल है। शिकायत करने पर वार्डन और सिक्योरिटी गार्ड मारपीट करते हैं, आई-कार्ड जब्त कर लेते हैं, परीक्षा से वंचित करने और फेल करने की धमकी देते हैं। जांच दल के सदस्यों ने जब सीहोर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को परिसर में प्रवेश कराना चाहा तो उन्हें भी मुख्य द्वार पर दो घंटे तक रोका गया। छात्रों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जो भी आवाज उठाता है, उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। मेस में परोसा जाने वाला खाना बदबूदार और कीड़ों वाला होता है, फिर भी सुधार के लिए कोई सुनवाई नहीं होती।

सबसे गंभीर खुलासा स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर हुआ। परिसर का स्वास्थ्य केंद्र क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट में पंजीकृत ही नहीं है। मेडिकल कचरा खुले में फेंका जाता है। पेयजल और स्विमिंग पूल के पानी का माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट वर्षों से नहीं कराया गया। पीलिया के मरीजों की सही जानकारी तक प्रबंधन ने जांच दल को देने से इनकार कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वविद्यालय की सारी ताकत दो-तीन लोगों के हाथ में सिमटी हुई है, बाकी अधिकारी केवल नाम के लिए हैं। पारदर्शिता और जवाबदेही का पूरी तरह अभाव है।

इन गंभीर खामियों को देखते हुए उच्च शिक्षा विभाग ने कुलाधिपति को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है और सात दिन में विस्तृत जवाब मांगा है। साथ ही मेस ठेकेदारों की मनमानी, स्वास्थ्य केंद्र की मान्यता, पेयजल की गुणवत्ता और छात्रों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले स्टाफ पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। छात्रों ने राहत की सांस ली है कि आखिर उनकी आवाज सुनी गई, लेकिन वे मांग कर रहे हैं कि सिर्फ नोटिस से काम नहीं चलेगा; प्रबंधन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो और दोषी अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर निजी विश्वविद्यालयों में छात्रों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत अधिकारों की अनदेखी के मुद्दे को सामने ला दिया है।

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