by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: हाल ही में जारी एक अंतरराष्ट्रीय शोध के मुताबिक, 2023 में भारत में पुरानी किडनी रोग (सीकेडी) से जूझ रहे मरीजों की तादाद 13.8 करोड़ हो गई, जो चीन के 15.2 करोड़ केसों के बाद दुनिया भर में दूसरे सबसे बड़े आंकड़े हैं। यह खुलासा ‘द लैंसेट’ जर्नल में छपी रिपोर्ट में हुआ है, जिसका नेतृत्व वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन इंस्टीट्यूट (आईएचएमई) ने किया। शोध में 1990 से 2023 तक के 204 देशों के स्वास्थ्य डेटा का गहन अध्ययन किया गया। रिपोर्ट बताती है कि सीकेडी अब दुनिया में मौत का नौवां सबसे बड़ा सबब बन गया है, जिससे पिछले साल करीब 15 लाख मौतें हुईं। यह रोग चुपचाप फैल रहा है और उन इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है जहां स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से कमजोर हैं।
रिपोर्ट के मुख्य नतीजों से स्पष्ट है कि आबादी के लिहाज से चीन और भारत में सीकेडी के सबसे ज्यादा केस हैं। भारत में यह संख्या 1990 के 6 करोड़ से उछलकर 2023 में 13.8 करोड़ पहुंच गई, जो दक्षिण एशिया की 16 प्रतिशत ऊंची दर को दिखाती है। अन्य देशों जैसे अमेरिका, इंडोनेशिया, जापान, ब्राजील, रूस, मैक्सिको, नाइजीरिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, फिलीपींस, वियतनाम, थाईलैंड और तुर्की में भी 1 करोड़ से ज्यादा वयस्क इससे प्रभावित हैं। पूरी दुनिया में सीकेडी से मौतों की उम्र-आधारित दर 1990 के 24.9 प्रति लाख से बढ़कर 2023 में 26.5 प्रति लाख हो गई, जबकि ज्यादातर अन्य घातक बीमारियों में यह दर घटी है।
सीकेडी को ‘चुपके से मारने वाला’ रोग कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती चरण (1 से 3) में संकेत कम दिखते हैं, जिससे करोड़ों लोग बिना इलाज के पीड़ित रह जाते हैं। अध्ययन में 14 मुख्य खतरे की पहचान की गई, जिनमें शुगर, हाई बीपी और मोटापा शीर्ष पर हैं। ये न केवल किडनी को खराब करते हैं, बल्कि दिल की बीमारियों को भी न्योता देते हैं। 2023 में, सीकेडी ने दुनिया भर की हृदय जटिलताओं से होने वाली मौतों में 12 प्रतिशत का हिस्सा लिया, जो डायबिटीज और मोटापे से आगे सातवां खतरा है। डॉक्टरों के अनुसार, डायबिटीज व हाइपरटेंशन किडनी की क्षमता को धीरे-धीरे नष्ट कर देते हैं, जिससे आखिरी स्टेज में डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की मजबूरी आ जाती है।
भारत में यह संकट तेज रफ्तार पकड़ रहा है, खासतौर पर शहरों में गलत खान-पान, स्ट्रेस और प्रदूषण की वजह से। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरी अफ्रीका व मिडिल ईस्ट में 18 प्रतिशत, दक्षिण एशिया में 16 प्रतिशत, तथा अफ्रीका के उप-सहारा भाग व लैटिन अमेरिका में 15 प्रतिशत दरें सबसे ज्यादा हैं। आईएचएमई के रिटायर्ड प्रोफेसर थियो वॉस ने टिप्पणी की, “यह बीमारी अन्य गैर-संक्रामक रोगों से कम सरकारी सुविधा पा रही है, जबकि इसका असर उन क्षेत्रों पर सबसे भारी पड़ रहा है जहां स्वास्थ्य असमानता चरम पर है।” शोध में सुझाव दिया गया है कि डायलिसिस व ट्रांसप्लांट जैसी किडनी बदलने वाली थेरेपी तक पहुंच सीमित होने से रोकथाम पर जोर देना जरूरी है।
विशेषज्ञों की राय है कि नियमित जांच, ब्लड शुगर व प्रेशर कंट्रोल तथा स्वस्थ आदतें अपनाकर इसकी रफ्तार रोकी जा सकती है। भारत सरकार को जांच सुविधाओं का विस्तार, सस्ती चिकित्सा उपलब्ध कराना, खतरे के कारकों को काबू करना तथा बचाव उपायों में खर्च बढ़ाने की सलाह दी गई है। इससे न केवल रोगियों व उनके परिवारों का बोझ हल्का होगा, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र पर दबाव भी कम पड़ेगा। अगर अभी कार्रवाई न हुई, तो यह स्वास्थ्य चुनौती और विकराल रूप धारण कर लेगी।
