by-Ravindra Sikarwar
गुरु नानक देव जी की 556वीं जयंती, जिसे प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है, के अवसर पर दुनिया भर में लाखों श्रद्धालु एकता, समानता और करुणा के संदेश को दोहरा रहे थे। लेकिन इस पवित्र पर्व पर भारत-पाकिस्तान सीमा पर एक दुखद घटना ने धार्मिक सद्भाव की भावना को ठेस पहुंचा दी। 4 नवंबर 2025 को अटारी-वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तानी अधिकारियों ने 14 भारतीय हिंदू श्रद्धालुओं को प्रवेश देने से इंकार कर दिया, क्योंकि वे सिख जत्थे का हिस्सा थे लेकिन हिंदू धर्म के अनुयायी थे। अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “तुम हिंदू हो, अपने मंदिरों में जाओ; सिख जत्थे के साथ नहीं जा सकते।” यह घटना न केवल धार्मिक भेदभाव को उजागर करती है, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को भी नंगा कर देती है। इन श्रद्धालुओं में से कई पाकिस्तान के मूल निवासी थे, जो बाद में भारत आकर नागरिक बने, और ननकाना साहिब—गुरु नानक का जन्मस्थान—पर प्रार्थना करने का उनका लंबा चला आ रहा सपना टूट गया।
घटना की पृष्ठभूमि और प्रकाश पुरब का महत्व:
गुरु नानक देव जी, सिख धर्म के संस्थापक, का जन्म 1469 में ननकाना साहिब (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनकी जयंती को प्रकाश पुरब के रूप में मनाया जाता है, जो सिख पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन आता है। इस वर्ष 5 नवंबर 2025 को मुख्य समारोह ननकाना साहिब के गुरुद्वारा जनम स्थान पर आयोजित हुआ, जहां पाकिस्तान सरकार ने सभी गुरुद्वारों को रोशनी से सजाया और विशेष आयोजन किए। गुरु नानक के उपदेश—जैसे कि ‘सबना जीआ का इक दाता’ (सभी जीवों का एक ही दाता)—सभी धर्मों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं, और हिंदू समुदाय भी उन्हें पूजनीय मानता है।
हर साल, भारत से हजारों सिख श्रद्धालु पाकिस्तान जाते हैं, और 2019 में खुलने वाले करतारपुर कॉरिडोर ने इस यात्रा को आसान बना दिया है। इस बार, भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों (मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के बाद तनाव) से सिख जत्थे को भेजने से इनकार कर दिया था, लेकिन शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के अनुरोध पर अनुमति दी गई। लगभग 1,900 सिख श्रद्धालु 4 नवंबर को अटारी-वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान पहुंचे, जो 13 नवंबर तक वहां रहेंगे। इनमें दिल्ली और लखनऊ के परिवार शामिल थे, जो ननकाना साहिब के अलावा गुरुद्वारा पंजा साहिब (हसन अब्दाल), गुरुद्वारा सच्चा सोडा (फरीदाबाद) और गुरुद्वारा दरबार साहिब (करतारपुर) का दर्शन करेंगे। लेकिन इसी जत्थे में शामिल 14 हिंदू श्रद्धालुओं की यात्रा बॉर्डर पर ही थम गई।
घटना का विस्तृत विवरण:
4 नवंबर को सुबह करीब 10 बजे, सिख जत्था अटारी से वाघा पहुंचा। सभी को पाकिस्तानी वीजा जारी हो चुके थे, और भारत के गृह मंत्रालय ने 2,100 श्रद्धालुओं की मंजूरी दी थी। जत्थे में अमर चंद (दिल्ली निवासी, पूर्व पाकिस्तानी नागरिक जो 1999 में भारत आए और 2010 में नागरिक बने) अपने छह परिवारजनों—पत्नी, बेटे-बेटी और अन्य रिश्तेदारों—सहित थे। अन्य प्रभावितों में लखनऊ के चार परिवार के सदस्य शामिल थे, जो सिंधी हिंदू पृष्ठभूमि से हैं। ये सभी गुरु नानक के उपदेशों से प्रेरित होकर यात्रा पर निकले थे।
बॉर्डर पार करते ही पाकिस्तानी इमिग्रेशन अधिकारियों ने इन 14 लोगों को अलग कर लिया। पूछताछ के दौरान अधिकारियों ने उनके नाम, धर्म और यात्रा उद्देश्य पर सवाल किए। अमर चंद ने बाद में मीडिया को बताया, “हमें कहा गया कि ‘तुम हिंदू हो, सिख जत्थे का हिस्सा नहीं हो सकते। अपने मंदिरों जाओ।’ हमने सफाई दी कि गुरु नानक सबके हैं, हम भी उनकी जयंती मनाने आए हैं, लेकिन उन्होंने सुना ही नहीं।” परिवारों ने यात्रा का खर्च—ट्रेन, बस और आवास—पहले ही उठा लिया था, लेकिन उन्हें बिना किसी सहायता के वापस भेज दिया गया। बाकी जत्था आगे बढ़ गया, जबकि ये श्रद्धालु आंसुओं में डूबे लौट आए। एक महिला ने कहा, “हमारे पूर्वज पाकिस्तान के थे, ननकाना साहिब हमारा भी तीर्थ है। यह भेदभाव हमें तोड़ गया।”
पाकिस्तानी अधिकारियों ने आधिकारिक बयान में कहा कि यात्रा सिख जत्थे के लिए मंजूर थी, और गैर-सिखों को अलग श्रेणी में रखा जाता है। लेकिन श्रद्धालुओं का आरोप है कि यह स्पष्ट धार्मिक भेदभाव था, खासकर जब गुरु नानक की शिक्षाएं सभी धर्मों की एकता पर जोर देती हैं।
प्रभावित परिवारों की कहानी और भावनात्मक आघात:
प्रभावितों में अमर चंद का परिवार सबसे अधिक चर्चा में है। अमर, जो सिंध प्रांत के मूल निवासी हैं, ने भारत में नई जिंदगी शुरू की लेकिन हमेशा ननकाना साहिब की यादों को संजोए रखा। उनकी बेटी ने कहा, “यह हमारा पहला मौका था। हमने महीनों की तैयारी की, लेकिन बॉर्डर पर ही सपना चूर हो गया।” लखनऊ के एक परिवार के मुखिया ने बताया कि वे गुरु नानक के ‘इक ओंकार’ के संदेश से जुड़े हैं, लेकिन पाकिस्तान की नीति ने उन्हें अपमानित किया। इन परिवारों को न केवल आर्थिक नुकसान हुआ (यात्रा खर्च करीब 50,000 रुपये प्रति व्यक्ति), बल्कि भावनात्मक रूप से भी गहरा सदमा पहुंचा। कई ने कहा कि यह घटना उनकी जड़ों से कनेक्ट होने की आखिरी उम्मीद तोड़ देती है।
भारत की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक तनाव:
घटना की खबर फैलते ही भारत में आक्रोश की लहर दौड़ गई। विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तानी अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा, और भारतीय दूतावास ने प्रभावितों को सहायता का आश्वासन दिया। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने इसे “धार्मिक असहिष्णुता” करार दिया। राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर निंदा की—कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, “गुरु नानक की शिक्षाओं का अपमान है यह।” भाजपा ने पाकिस्तान की “विभाजनकारी मानसिकता” पर चुटकी ली। सोशल मीडिया पर #JusticeForHinduPilgrims और #GuruNanakUnity जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे, जहां लोग गुरु नानक के उद्धरण शेयर कर रहे हैं।
यह घटना भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिए एक और झटका है। 2019 के करतारपुर कॉरिडोर समझौते के बावजूद, पाकिस्तान पर 20 डॉलर शुल्क लगाने और गैर-सिखों को सीमित करने के आरोप लगते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम क्षेत्रीय शांति प्रयासों को कमजोर करता है, खासकर जब वैश्विक स्तर पर धार्मिक सद्भाव की अपील हो रही है।
व्यापक निहितार्थ और भविष्य की संभावनाएं:
यह विवाद सिख-हिंदू एकता को मजबूत करता है, लेकिन पाकिस्तान की नीतियों पर सवाल उठाता है। गुरु नानक के संदेश—जाति, धर्म से परे मानवता—की रोशनी में, यह घटना विडंबना पैदा करती है। भारत सरकार ने श्रद्धालुओं को वैकल्पिक तीर्थयात्रा की पेशकश की है, जैसे अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में विशेष पूजा। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि द्विपक्षीय समझौतों में सभी धर्मों के लिए समावेशी प्रावधान जोड़े जाएं।
प्रकाश पुरब के इस अवसर पर, जबकि दुनिया गुरु नानक के ‘नाम जपो’ के संदेश से प्रेरित हो रही है, यह घटना हमें याद दिलाती है कि सीमाओं के पार भी भेदभाव बाकी है। प्रभावित परिवारों की अपील है कि भविष्य में ऐसी यात्राएं सभी के लिए खुली हों, ताकि धार्मिक स्थलों का सम्मान सच्चा हो। पाकिस्तान सरकार ने अभी तक कोई औपचारिक माफी नहीं मांगी, लेकिन दबाव बढ़ रहा है। यह मामला न केवल धार्मिक अधिकारों का, बल्कि मानवीय मूल्यों का भी प्रश्न है।
