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Sasaram: बिहार सरकार दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएँ चलाती है और करोड़ों रुपये खर्च करती है। लेकिन सासाराम की सड़कों पर एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करती है। जिला मुख्यालय पर बैठे अधिकारियों के बावजूद कई दिव्यांगजन सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पा रहे हैं और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी संघर्षपूर्ण तरीके से जीने को मजबूर हैं।

Sasaram: सड़क पर जीने को मजबूर दिव्यांग

रमेश कुमार, जो सासाराम के निवासी हैं, पिछले कई वर्षों से अपनी ज़िंदगी सड़क पर रेंगकर बिता रहे हैं। बचपन से ही दिव्यांगता का शिकार होने के कारण उन्हें रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई होती है। पेट पालने के लिए भीख मांगना उनकी मजबूरी बन गई है। रमेश ने बताया कि उन्हें केवल मामूली पेंशन मिलती है, लेकिन ट्राई-साइकिल या अन्य सहायक उपकरण अब तक नहीं मिले, जिससे उनका जीवन आसान हो सके।

Sasaram: सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन नाकाम

यह मामला समाज कल्याण विभाग की योजनाओं के क्रियान्वयन में हो रही लापरवाही को उजागर करता है। दशकों से सरकारी दावे और योजनाएँ भले हों, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका लाभ सही ढंग से लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा है। रमेश जैसे कई दिव्यांगजन सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलने के कारण समाज में हाशिए पर हैं।

प्रशासन की प्रतिक्रिया

मीडिया में मामला आने के बाद ही प्रशासन ने कदम उठाया। जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण कोषांग के सहायक निदेशक आफताब करीम ने कहा कि मामला अब उनके संज्ञान में है। उन्होंने आश्वासन दिया कि जल्द ही रमेश कुमार से आवेदन प्राप्त करके उन्हें ट्राई-साइकिल सहित अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।

उम्मीद और सुधार की राह

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाएँ प्रशासनिक और नीतिगत सुधार की आवश्यकता को दर्शाती हैं। यदि योजनाओं का सही समय पर क्रियान्वयन हो, तो दिव्यांगजन भी सम्मानपूर्वक और आत्मनिर्भर जीवन जी सकते हैं। प्रशासन की सक्रियता और संवेदनशीलता ही इन कमजोर वर्गों की जिंदगी बदल सकती है।

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