Pakhanjur : छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में अक्सर मुठभेड़ और हिंसा की खबरें आती हैं, लेकिन इस बार सुरक्षा बलों ने ‘मानवता’ को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है। पखांजूर क्षेत्र के जंगलों में ऑपरेशन पर निकले जवानों ने भूख और प्यास से तड़प रहे नक्सलियों की मदद कर एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा अब पूरे देश में हो रही है।
जंगल में भूखे-प्यासे मिले नक्सली: जवानों ने निभाया ‘इंसानियत’ का धर्म
Pakhanjur मिली जानकारी के अनुसार, सुरक्षा बल के जवान जब सर्चिंग ऑपरेशन पर थे, तब उनका सामना जंगल में भटक रहे कुछ नक्सलियों से हुआ। ये नक्सली कई दिनों से भोजन और पानी के अभाव में अत्यंत कमजोर और बेहाल स्थिति में थे। जवानों ने अपनी रणनीति बदलते हुए उन पर सख्ती दिखाने के बजाय पहले उनकी जान बचाना जरूरी समझा।
जवानों ने अपने हिस्से का भोजन और पानी उन नक्सलियों को उपलब्ध कराया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे वर्दीधारी जवान और हथियार छोड़ने को तैयार नक्सली एक साथ बैठकर भोजन कर रहे हैं। इस एक छोटे से कदम ने नक्सलियों के मन में सुरक्षा बलों के प्रति बरसों से भरे डर और नफरत को खत्म कर दिया।
भरोसे की जीत: तीन हार्डकोर नक्सलियों ने किया आत्मसमर्पण
Pakhanjur जवानों की इस संवेदनशीलता और निस्वार्थ मदद का असर तुरंत देखने को मिला। भोजन करने के बाद उन नक्सलियों को यह अहसास हुआ कि मुख्यधारा में लौटना ही उनके हित में है। इसी का परिणाम रहा कि राधिका कुंजाम, संदीप कड़ियाम और रैनु पद्मा ने हिंसा का रास्ता छोड़ने का फैसला किया। इन तीनों ने परतापुर थाने पहुँचकर पुलिस अधिकारियों के समक्ष औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया। अधिकारियों का मानना है कि जवानों के इस व्यवहार ने नक्सलियों के भीतर सुरक्षा बलों के प्रति विश्वास की एक मजबूत नींव रख दी है।
शांति बहाली की दिशा में बड़ा कदम: प्रशासन ने की सराहना
Pakhanjur बस्तर और कांकेर जैसे इलाकों में यह घटना ‘विश्वास, विकास और सुरक्षा’ की रणनीति का एक जीवंत उदाहरण बनकर उभरी है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने जवानों की इस पहल की मुक्तकंठ से सराहना की है।
- सकारात्मक संकेत: विशेषज्ञों का कहना है कि गोली के जवाब में रोटी और सहानुभूति देने से नक्सलियों के निचले कैडर में यह संदेश जाएगा कि सरकार और बल उनके दुश्मन नहीं हैं।
- रणनीतिक बदलाव: यह घटना दर्शाती है कि मनोवैज्ञानिक बदलाव और सहानुभूति के जरिए बिना खून बहाए भी नक्सल उन्मूलन अभियान को सफल बनाया जा सकता है।
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