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by-Ravindra Sikarwar

स्थायी भरण-पोषण सामाजिक न्याय का साधन है, न कि धन-संपत्ति बराबर करने या आर्थिक समानता स्थापित करने का उपकरण; रेलवे अधिकारी पत्नी की याचिका खारिज

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वतंत्र पति या पत्नी को स्थायी भरण-पोषण (एलिमनी) प्रदान नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य केवल वास्तविक आर्थिक आवश्यकता को पूरा करना है, न कि उन व्यक्तियों के बीच आर्थिक स्तर को बराबर करना जो पहले से ही अपनी आजीविका चला सकते हैं। यह निर्णय हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत न्यायिक विवेक के सही उपयोग पर आधारित है, जहां अदालत को पक्षकारों की आय, कमाई की क्षमता, संपत्ति, आचरण और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों का मूल्यांकन करना होता है। न्यायमूर्ति अनिल खेतरीपाल और हरिश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने यह टिप्पणी एक रेलवे अधिकारी महिला की अपील पर सुनवाई के दौरान की, जो अपने वकील पति से तलाक के बाद स्थायी भरण-पोषण और मुआवजे की मांग कर रही थी।

मामले का पृष्ठभूमि और विवरण:
यह मामला 2010 में हुई एक शादी से जुड़ा है, जिसमें दंपति ने केवल एक वर्ष साथ रहने के बाद अलगाव का मार्ग अपनाया। पत्नी, जो भारतीय रेलवे यातायात सेवा (ग्रुप ‘ए’) की वरिष्ठ अधिकारी हैं, ने उच्च न्यायालय में परिवार न्यायालय के 2023 के फैसले को चुनौती दी थी। परिवार न्यायालय ने क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद को मंजूरी दी थी और भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया था। अपीलकर्ता महिला ने दावा किया था कि परिवार न्यायालय ने क्रूरता का गलत आकलन किया और भरण-पोषण से इनकार कर दिया, जबकि उन्होंने 50 लाख रुपये के निपटारे के बदले तलाक पर सहमति जताई थी।

न्यायालय ने पाया कि महिला का रुख तलाक के प्रति विरोधी नहीं था, बल्कि यह मुख्य रूप से वित्तीय सुरक्षा की मांग पर आधारित था। पीठ ने कहा, “जब कोई पक्षकार विवाह विच्छेद का विरोध करते हुए भी उसी के बदले में भारी राशि की मांग करता है, तो यह स्पष्ट करता है कि उनका विरोध स्नेह, सुलह या वैवाहिक बंधन को बचाने पर नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ पर केंद्रित है।”  इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी नोट किया कि महिला ने पति और उनकी मां के खिलाफ अपमानजनक भाषा का उपयोग किया था, जिसमें पति को अवैध जन्म का बताना शामिल था, जो मानसिक क्रूरता का रूप था।

न्यायालय के प्रमुख अवलोकन और तर्क:
पीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 पर विस्तार से चर्चा की, जो अदालत को स्थायी भरण-पोषण और रखरखाव प्रदान करने का अधिकार देती है। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान “मूल रूप से निष्पक्ष प्रकृति का है” और इसका उपयोग तब किया जाना चाहिए जब कोई पक्षकार स्वतंत्र साधनों के अभाव में दरिद्रता की स्थिति में न पहुंच जाए। “धारा 25 के तहत न्यायिक विवेक का प्रयोग तब नहीं किया जा सकता जब याचिकाकर्ता आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हो। यह विवेक रिकॉर्ड, पक्षकारों की सापेक्ष वित्तीय क्षमताओं और याचिकाकर्ता की आर्थिक कमजोरी के प्रमाण के अभाव पर आधारित होना चाहिए,” पीठ ने कहा।

न्यायालय ने आगे कहा कि भरण-पोषण का कानूनी आधार वास्तविक वित्तीय सहायता की आवश्यकता साबित करना है। “स्थायी भरण-पोषण सामाजिक न्याय का उपाय है, न कि उन सक्षम व्यक्तियों के बीच संपत्ति बढ़ाने या वित्तीय समानता स्थापित करने का साधन।”  इस मामले में, सहवास की छोटी अवधि (केवल एक वर्ष), संतान का अभाव, अपीलकर्ता की मजबूत और स्वतंत्र आय तथा वित्तीय आवश्यकता के कोई विश्वसनीय प्रमाण न होने से भरण-पोषण का कोई आधार नहीं बनता।

फैसले का निहितार्थ और व्यापक प्रभाव:
यह फैसला भारत में बढ़ती उच्च मूल्य वाली भरण-पोषण दावों पर बढ़ती जांच का हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न्यायालयों को अधिक विवेकपूर्ण और प्रमाण-आधारित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा, जहां भरण-पोषण को केवल उन मामलों में प्रदान किया जाए जहां वास्तविक आर्थिक असहायता हो। यह भी जोर देता है कि भरण-पोषण कोई स्वत: अधिकार नहीं है, बल्कि यह सिद्ध करने योग्य आवश्यकता पर निर्भर करता है।

इस निर्णय से परिवार कानून में एक नया मानक स्थापित हो सकता है, खासकर कामकाजी महिलाओं या पुरुषों के मामलों में, जहां दोनों पक्ष आर्थिक रूप से मजबूत हों। न्यायालय ने अपील खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और भरण-पोषण की मांग को अस्वीकार कर दिया। यह फैसला न केवल इस मामले को समाप्त करता है, बल्कि भविष्य के विवादों में न्यायिक दिशानिर्देश प्रदान करता है।

(बार एंड बेंच, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस और अन्य विश्वसनीय स्रोतों से संकलित)