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रिपोर्टर: सन्‍तोष सरावगी

Dabra : स्वास्थ्य विभाग और सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्थाएं अब गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। डबरा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ कई डॉक्टर प्रशासनिक सांठगांठ, राजनीतिक दबाव या रसूख के बल पर ग्वालियर में अटैच होकर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लंबे समय से अटैच चल रहे ये डॉक्टर डबरा में अपनी ड्यूटी देने के बजाय ग्वालियर और डबरा के निजी अस्पतालों, क्लीनिकों व मेडिकल स्टोर्स में व्यस्त हैं। इस वजह से ग्रामीण व स्थानीय मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है।

कागजों में रिलीव का आदेश, धरातल पर शून्य असर

Dabra विधानसभा चुनाव के दौरान डबरा के मूल पद से ग्वालियर अटैच हुए सभी डॉक्टरों को रिलीव कर वापस डबरा भेजने का आधिकारिक आदेश जारी हुआ था। हालांकि, यह आदेश सिर्फ चुनावी व प्रशासनिक खानापूर्ति तक ही सीमित रह गया। डॉ. संध्या बांगर, डॉ. स्वाती अग्रवाल, डॉ. गरिमा जैन, डॉ. रवि वर्मा, डॉ. आकाश शर्मा और डॉ. खातून जैसे कई चिकित्सक आदेश के बाद भी अपने मूल पदस्थापना स्थल पर नहीं पहुंचे।

कुछ डॉक्टर बारईपनिहार और आसपास के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ हैं, लेकिन उनका डबरा में मेडिकल स्टोर और निजी प्रैक्टिस चल रही है। हद तो यह है कि कुछ डॉक्टर हफ्ते में सिर्फ एक दिन इमरजेंसी ड्यूटी कर पूरे सात दिन गायब रहते हैं, लेकिन उन्हें नियमित रूप से पूरा वेतन दिया जा रहा है।

सार्थक ऐप की हाजिरी और वेतन वितरण पर उठे सवाल

Dabra मध्य प्रदेश शासन द्वारा डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए ‘सार्थक ऐप’ लागू किया गया है, लेकिन डबरा में इसकी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जो डॉक्टर महीनों से शाम या दोनों समय ड्यूटी से गायब रहते हैं, उनकी बायोमेट्रिक व ऐप हाजिरी कैसे दर्ज हो रही है और उनका वेतन कैसे पास किया जा रहा है? मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CHMO) और ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी (CBMO) की इस कथित लापरवाही या चुप्पी ने पूरे सिस्टम पर उंगली उठा दी है। आयुष और होम्योपैथिक डॉक्टर भी कागजों में पदस्थ हैं, लेकिन धरातल पर वे अस्पताल से नदारद रहते हैं।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की मौजूदगी के बावजूद ठप पड़ीं स्वास्थ्य सेवाएं

Dabra डबरा के सिविल अस्पताल में डेंटिस्ट, आई सर्जन, एनेस्थेटिस्ट और हड्डी रोग के विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती है, फिर भी मरीजों को सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

  • ऑपरेशन थिएटर (OT) बंद: अस्पताल में सर्जन (जैसे डॉ. राकेश कुरेले) की उपस्थिति केवल हाजिरी लगाने तक सीमित रहती है, जबकि वे बाकी समय निजी प्रैक्टिस में बिताते हैं। नसबंदी शिविरों के बाद ओटी को फिर से बंद कर दिया गया।
  • डायलिसिस व पैथोलॉजी लैब की बदहाली: अस्पताल में डायलिसिस रूम की सुविधा मौजूद होने के बाद भी उसका समुचित उपयोग नहीं हो रहा है।
  • निजीकरण का बोलबाला: सरकारी पैथोलॉजी लैब में कर्मचारियों का अमला होने के बावजूद मरीजों को समय पर जांच रिपोर्ट नहीं मिलती और न ही रात में इमरजेंसी जांचें की जाती हैं। निजी लैब संचालकों को फायदा पहुंचाने के लिए जांच व्यवस्था का निजीकरण कर मरीजों की जेब ढीली की जा रही है।

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