रिपोर्टर: वेदान्त साहू
Wave of Grief in the Sports World : भारतीय खेल जगत के लिए एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। देश के महान निशानेबाज और विख्यात कोच जसपाल राणा का दिल्ली के एक अस्पताल में दिल से जुड़ी बीमारियों (हार्ट कॉम्प्लिकेशंस) के कारण निधन हो गया है। वह मात्र 49 वर्ष के थे। जसपाल राणा ने न सिर्फ एक खिलाड़ी के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगे का मान बढ़ाया, बल्कि एक मार्गदर्शक के रूप में देश को कई नए चैंपियन भी दिए। उनके इस आकस्मिक निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा सहित देश की तमाम बड़ी हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है।

Wave of Grief in the Sports World चैंपियन से लेकर ‘द्रोणाचार्य’ तक का शानदार सफर
जसपाल राणा भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में एक चमकता सितारा थे। उन्होंने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया था, जिसके लिए साल 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने उन्हें प्रतिष्ठित ‘पद्म श्री’ पुरस्कार से भी नवाजा था। सक्रिय खेल से संन्यास लेने के बाद उन्होंने बतौर कोच युवा प्रतिभाओं को निखारने का जिम्मा संभाला। उनके मार्गदर्शन की सबसे बड़ी मिसाल स्टार शूटर मनु भाकर हैं, जिन्हें राणा ने ही पेरिस ओलंपिक में ऐतिहासिक दोहरा कांस्य पदक (Double Bronze Medal) जीतने के काबिल बनाया था।
Wave of Grief in the Sports World पीएम मोदी और खेल दिग्गजों ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
राणा के असामयिक निधन की खबर मिलते ही खेल और राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए लिखा, “श्री जसपाल राणा जी के निधन से अत्यंत दुखी हूँ। उनका जाना भारतीय खेल जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।” वहीं, अभिनव बिंद्रा सहित कई सीनियर एथलीटों ने भी उन्हें याद करते हुए कहा कि जसपाल ने देश में शूटिंग के खेल को एक नई पहचान दी थी।
Wave of Grief in the Sports World भारतीय खेल इतिहास में अमर रहेगा जसपाल राणा का योगदान
49 वर्षीय जसपाल राणा का जाना भारतीय खेल पारिस्थितिकी तंत्र (Sports Ecosystem) के लिए एक ऐसा शून्य छोड़ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। 1990 और 2000 के दशक में अपनी अचूक निशानेबाजी से दुनिया को लोहा मनवाने वाले राणा, कोचिंग के दिनों में अपने कड़े अनुशासन और बेहतरीन तकनीक के लिए जाने जाते थे। खेल विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने अपने शिष्यों में जो जीतने का जज्बा भरा है, वह आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
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