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Report by: Sanjeev Kumar

Bokaro : आदिम संस्कृति और प्रकृति के अटूट प्रेम का प्रतीक ‘सरहुल’ पर्व आज बोकारो जिले में पूरे पारंपरिक हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया गया। ढोल-नगाड़ों की थाप और मांदर की गूंज के बीच आदिवासी समाज के लोगों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संकल्प दोहराया। शहर के विभिन्न हिस्सों से पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालुओं का जत्था ‘जाहिर थान’ (सरना स्थल) पर पूजा-अर्चना के बाद भव्य जुलूस के रूप में बिरसा चौक पहुँचा, जहाँ उत्सव का नजारा देखते ही बनता था।

सखुआ के फूलों की पूजा और प्रकृति संरक्षण का संदेश

Bokaro सरहुल को पूर्णतः प्रकृति का पर्व माना जाता है। इस अवसर पर विशेष रूप से सखुआ (साल) के वृक्ष और उसके फूलों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि सखुआ के फूल खिलने के साथ ही नए साल की शुरुआत होती है। पाहन (पुजारी) द्वारा सखुआ के फूलों को घर-घर बांटकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया गया। यह पर्व सदियों से पर्यावरण संतुलन और पेड़ों के महत्व को रेखांकित करता आ रहा है, जो आज के वैश्विक पर्यावरण संकट के दौर में और भी प्रासंगिक हो गया है।

प्रशासनिक अधिकारियों ने बढ़ाया उत्साह

Bokaro उत्सव की रौनक बढ़ाने के लिए बोकारो के उपायुक्त (DC) अजय नाथ झा और पुलिस अधीक्षक (SP) भी कार्यक्रम में शामिल हुए। उपायुक्त ने आदिवासी समाज के साथ मिलकर प्रकृति की पूजा की और इस परंपरा की सराहना की।

उपायुक्त अजय नाथ झा ने कहा: “आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब सरहुल जैसे पर्व हमें जड़ों की ओर लौटने और प्रकृति को बचाने का मार्ग दिखाते हैं। अगर पेड़-पौधे नहीं बचेंगे तो मानव सभ्यता का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। हमें इस पर्व से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए।”

पारंपरिक नृत्य और जुलूस से थमा शहर

Bokaro बिरसा चौक पर जुटे हजारों की संख्या में महिला-पुरुष और युवाओं ने पारंपरिक गीतों पर थिरकते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया। सफेद और लाल रंग की पारंपरिक साड़ियों और धोती में सजे लोगों के हाथों में सखुआ की टहनियां और मांदर की थाप ने पूरे बोकारो को उत्सव के रंग में सराबोर कर दिया। प्रशासन की ओर से जुलूस के मार्ग पर सुरक्षा और यातायात के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।

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