Spread the love

By: Ravindra Sikarwar

मध्य प्रदेश के महाकौशल क्षेत्र में स्थित दमोह जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पहली शाखा की नींव 1937 के नवंबर महीने में रखी गई। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वयं जबलपुर से दमोह पहुंचे और उन्होंने प्रसिद्ध वैद्य शेण्डये को संबोधित एक पत्र के साथ इस कार्य की शुरुआत की। उनके साथ बालासाहब आपटे और चरकर भी थे। ये सभी वैद्य शेण्डये के घर पर ठहरे और अगले दिन कार्तिक एकादशी के पावन अवसर पर पहली शाखा आयोजित की गई।

इसके बाद उन्होंने अधिवक्ता मणिशंकर दवे के निवास पर जाकर प्रारंभिक विचार-विमर्श किया। उसी शाम श्रीकृष्ण गुप्ता और कुंजबिहारी लाल गुरु से मुलाकात हुई, जिन्हें जिले का पहला संघचालक नियुक्त किया गया।

कार्य का विस्तार और प्रचारक
1938 की शुरुआत में नागपुर से वसंतराव देव दमोह आए और उन्होंने शुरुआती स्वयंसेवकों के साथ मिलकर महाराणा प्रताप विद्यालय के मैदान में शाखा लगाई। इसी वर्ष के अंत में एकनाथ रानाडे पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में दमोह पहुंचे, जिससे शाखाओं का तेजी से प्रसार हुआ।

दमोह के स्वयंसेवकों में मधुकर राव सोनवलकर, वसंतराव पाठक, रामशंकर अग्रवाल, विनायक राव शेण्डये, वेदराज दुआ, गंगाधर राव सप्रे, तांबे वकील, ओ. कृष्णा सप्रे, सीताराम शेण्डये, श्रीकृष्ण सेलट और गणपति गाड़े जैसे नाम प्रमुख थे।

1943 तक संघ का कार्य जिले की तहसीलों जैसे बांसा, तारखेड़ा और हटा तक फैल चुका था। हटा में भाई शंकर त्रिवेदी को संघचालक बनाया गया।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दमोह के स्वयंसेवकों ने सक्रिय सत्याग्रह किया। वेदराज दुआ, त्रिभुवन शंकर धाट और कोमलचंद मोदी ने इसका नेतृत्व संभाला। इस दौरान कई स्वयंसेवकों को पुलिस की लाठियां भी सहनी पड़ीं। पहले सत्याग्रह में जिले से करीब 175 स्वयंसेवक जेल गए। उस समय गणपति वैद्य प्रचारक थे। योजना के तहत पत्रक छापे गए, मोहन सिनेमा हॉल में वितरित किए गए और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा गया।

दूसरे प्रतिबंध के दौरान हालांकि सत्याग्रह नहीं हुआ, लेकिन धारा 151 के तहत लगभग 200 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

विभाजन काल और आगे की प्रगति
देश के विभाजन के समय दमोह में दो प्रभात फेरे और पांच सायं शाखाएं नियमित चल रही थीं, जिनमें दैनिक औसत उपस्थिति 300 के करीब रहती थी। 1947 तक स्वयंसेवकों की संख्या लगभग 600 पहुंच गई थी।

इस अवधि में बाबासाहब आपटे नियमित रूप से जिले का दौरा करते रहे। श्री गुरुजी ग्रीष्म शिविर और सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने दमोह आए। वे एक बार जबलपुर से सागर जाते हुए वेदराज दुआ के घर भी ठहरे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय और दत्तोपंत ठेंगड़ी भी जिले के प्रवास पर आए।

अनुषांगिक संगठन और कार्यालय
आरएसएस के साथ-साथ जिले में विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय किसान संघ, मध्यप्रदेश शिक्षक संघ और अधिवक्ता परिषद जैसे सहयोगी संगठनों का कार्य भी सुचारु रूप से चल रहा है।

संघ के कार्यालय विभिन्न स्थानों पर रहे—श्रीधर राव सोनवलकर का मकान (राम मंदिर के पास), बंगाली मिस्त्री का मकान, सुरेशचंद चौधरी की दुकान के ऊपर, रतनचंद नायक का मकान, राम मंदिर परिसर में माधव कुंज और वर्तमान में कानिटकर भवन के निकट अपना स्वतंत्र कार्यालय।

जिले के प्रमुख प्रचारकों में दामोदर गिरि भट्ट, एकनाथ रानाडे, गजपति वैद्य, मधुकर राव देशपांडे, कमलाकर, गजराज सिंह, पांडुरंग मोघे, चंद्रप्रकाश वर्मा आदि शामिल हैं।

डॉ. हेडगेवार के विचार
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने कहा था—“वास्तव में शक्ति उतनी ही पवित्र और मंगलमय है, जितनी आध्यात्मिक शक्ति। हमें हिंसा करने के लिए बलवान नहीं बनना है, बल्कि संसार की समस्त हिंसा और अत्याचार को सदा के लिए समाप्त करने हेतु सामर्थ्य संपादन करना है।”

यह यात्रा दमोह में संघ कार्य की मजबूती और समर्पण का प्रतीक है, जो राष्ट्र निर्माण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही है।