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नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक दलित परिवार के साथ कथित मारपीट का मामला अब राजनीतिक मुद्दा बनता नजर आ रहा है। मामले में आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया है। वहीं, सीजेपी नेता आशुतोष रांका की समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस मुद्दे को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

इंडिया टीवी के कार्यक्रम ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में इस पूरे घटनाक्रम और इसके संभावित राजनीतिक प्रभाव पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, प्रोफेसर चंद्रचूर्ण सिंह और राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने अपनी राय रखी।

जंतर-मंतर की घटना के बाद बढ़ा दबाव

मामला सोशल मीडिया पर चर्चित दलित युवती निशु आजाद की ओर से अपने पिता के साथ कथित मारपीट का मुद्दा उठाए जाने के बाद सामने आया। इसके बाद आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद ने भी मामले को लेकर दिल्ली पुलिस पर कार्रवाई का दबाव बनाया।

विपक्षी नेताओं की सक्रियता के बीच पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लिया। मामले को लेकर एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई और ऑनलाइन धमकियों की शिकायतों को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई है।

कांग्रेस भी हुई सक्रिय

मामले में कांग्रेस की ओर से भी हस्तक्षेप किए जाने की बात सामने आई। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के अनुसार, पार्टी के कानूनी विभाग की ओर से वकीलों की एक टीम थाने पहुंची और पुलिस के सामने कार्रवाई से जुड़ी मांगें रखीं।

एक ही मामले में कांग्रेस नेताओं, वकीलों, चंद्रशेखर आजाद और सीजेपी से जुड़े नेताओं की सक्रियता को राजनीतिक विश्लेषक विपक्षी दलों के बीच संभावित समन्वय के संकेत के तौर पर देख रहे हैं।

यूपी में दलित राजनीति पर नजर

इस पूरे घटनाक्रम का असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। सीजेपी नेता आशुतोष रांका की अखिलेश यादव से मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी है।

विश्लेषकों के मुताबिक, आगामी चुनावों से पहले विपक्ष दलित, ओबीसी, युवा और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने की कोशिश कर सकता है। ऐसे में दलित उत्पीड़न से जुड़े मुद्दे चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

बदल रहा है दलित वोट का समीकरण

उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता लंबे समय से चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, पिछले कुछ चुनावों में गैर-जाटव दलित मतदाताओं के रुझान में बदलाव देखने को मिला है।

2024 के लोकसभा चुनाव में गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच विपक्षी गठबंधन की स्थिति मजबूत होने का दावा किया गया। इससे यूपी की राजनीति में दलित वोटों के संभावित नए ध्रुवीकरण को लेकर चर्चा बढ़ी है।

नैरेटिव की लड़ाई भी तेज

विपक्ष जहां दलित अधिकार, सामाजिक न्याय और संविधान जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार कानून-व्यवस्था, विकास, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को अपनी प्रमुख राजनीतिक प्राथमिकताओं के रूप में सामने रख रही है।

रोजगार और सरकारी योजनाओं को लेकर भी सत्तापक्ष अपनी उपलब्धियां गिना रहा है। ऐसे में आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में राजनीतिक मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि नैरेटिव और सामाजिक समीकरणों की लड़ाई का भी हो सकता है।

क्या यूपी में बनेगा नया समीकरण?

दिल्ली की घटना के बाद विपक्षी नेताओं की सक्रियता और उत्तर प्रदेश में होने वाली राजनीतिक मुलाकातों ने नए समीकरणों की अटकलों को बढ़ा दिया है। हालांकि, इन घटनाक्रमों का चुनावी असर कितना होगा, यह आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम और मतदाताओं के रुझान पर निर्भर करेगा।

डिस्क्लेमर: यह लेख कार्यक्रम में हुई चर्चा और उसमें शामिल वक्ताओं द्वारा व्यक्त विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त राजनीतिक विश्लेषण संबंधित वक्ताओं के विचार हैं।