
नई दिल्ली: देश की पुलिस व्यवस्था गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, पुलिस विभाग में स्वीकृत पदों में से 23% खाली हैं। इसका सीधा असर पुलिसकर्मियों की संख्या पर पड़ रहा है, 2023 में प्रति एक लाख लोगों पर केवल 155 पुलिसकर्मी ही उपलब्ध थे, जबकि मानक संख्या 197 होनी चाहिए।
इतना ही नहीं, देश के 17% पुलिस थानों में एक भी क्लोज सर्किट टेलीविजन (CCTV) कैमरा नहीं लगा है, जबकि आदर्श रूप से प्रत्येक थाने में 12-13 कैमरे होने चाहिए। वहीं, जिन 83% थानों में कैमरे मौजूद हैं, उनमें ऐसे थाने भी शामिल हैं जहाँ सिर्फ एक CCTV कैमरा स्थापित है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश की पुलिस फोर्स में 17% अनुसूचित जाति (SC), 12% अनुसूचित जनजाति (ST) और 31% अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के कर्मचारी हैं। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 में पुलिस, जेल और अदालतों के प्रदर्शन के आधार पर राज्यों की रैंकिंग और संबंधित आंकड़े जारी किए गए हैं। समग्र रैंकिंग में कर्नाटक पहले स्थान पर है, जबकि पश्चिम बंगाल सबसे निचले पायदान पर है।
वरिष्ठ महिला अफसरों की संख्या नगण्य
एक अन्य चिंताजनक तथ्य यह है कि देश के पुलिस बल में वरिष्ठ महिला अधिकारियों की संख्या बहुत कम है। 20.3 लाख के विशाल पुलिस बल में सुपरिंटेंडेंट और डीजी स्तर पर कार्यरत महिला वरिष्ठ अधिकारियों की संख्या एक हजार से भी कम है। पुलिस बल में कार्यरत कुल महिला कर्मियों का 90% हिस्सा कांस्टेबल स्तर का है। टाटा ट्रस्ट सहित कुछ संस्थानों द्वारा तैयार की गई इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (आईजेआर) 2025 में न्याय व्यवस्था के मोर्चे पर जारी रैंकिंग में दक्षिणी राज्यों का प्रदर्शन बेहतर रहा है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर हैं, जबकि राजस्थान 14वें, मध्य प्रदेश सातवें और छत्तीसगढ़ छठे स्थान पर हैं। हालांकि राजस्थान में पुलिस अधिकारियों के 50% पद खाली हैं, लेकिन राज्य ने न्यायपालिका में सबसे अधिक सुधार दिखाया है। आईजेआर में एक करोड़ से अधिक आबादी वाले 18 बड़े और मध्यम राज्यों की रैंकिंग जारी की गई है।
कर्मचारियों की भारी कमी और सुरक्षा के अधूरे इंतजाम
रिपोर्ट में साल 2022 और 2023 के आंकड़ों की तुलना करते हुए कर्मचारियों की कमी और सुरक्षा व्यवस्था की अपर्याप्तता को दर्शाया गया है:
| कैटेगरी | साल 2023 | साल 2022 |
|---|---|---|
| खाली पद | 23% | 22% |
| महिला पुलिसकर्मी | 12.3% | 11.8% |
| CCTV वाले थाने | 83% | 73% |
| वुमन हेल्प डेस्क वाले थाने | 78% | 72% |
पुलिस में महिलाओं की स्थिति
देश में कुल लगभग 2.43 लाख महिला पुलिसकर्मियों में से केवल 960 अधिकारी ही भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) रैंक की हैं। गैर-आईपीएस श्रेणी के लगभग 3.10 लाख पदों में केवल 24,322 महिलाएं कार्यरत हैं। कांस्टेबल और हेड कांस्टेबल के 17.24 लाख पदों में से मात्र 2.17 लाख महिलाएं ही सेवा में हैं।
रैंकिंग का निर्धारण
न्याय व्यवस्था से जुड़ी चार प्रमुख संस्थाओं – पुलिस, न्यायपालिका, जेल और विधिक सहायता – का मूल्यांकन छह प्रमुख मानदंडों पर किया गया। ये मानदंड थे: बजट, मानव संसाधन, कार्यभार, विविधता, बुनियादी ढाँचा और रुझान।
मानकों का उल्लंघन
रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत, जहाँ प्रति एक लाख आबादी पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए, भारत में यह संख्या केवल 120 है। अधिकारियों के 28% और सिपाहियों के 21% पद खाली हैं। देश में पुलिस-जनसंख्या अनुपात 1:831 है।
विशेषज्ञों की राय
आईजेआर पर टिप्पणी करते हुए, सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने कहा कि पुलिस थाने और जिला अदालतें न्याय प्रणाली की अग्रिम पंक्ति हैं। इन्हें पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण न मिलने से न्याय व्यवस्था प्रभावित होती है, जिससे जनता का विश्वास कमजोर होता है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की स्थिति
राजस्थान:
- खराब: पुलिस अधिकारियों के 50% पद खाली, कानूनी सहायता प्रदान करने में 18 राज्यों में अंतिम स्थान, 37% जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा नहीं (सबसे खराब स्थिति)।
- बेहतर: जिला अदालतों में केस निस्तारण दर 2016-17 के बाद पहली बार 100%, पुलिस बल में महिलाओं की संख्या 10.9% (पड़ोसी राज्यों से अधिक)।
मध्य प्रदेश:
- खराब: जेल अधिकारियों के 43% पद खाली, पुलिस बल में एससी-एसटी-ओबीसी के पद खाली, हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के 38% पद रिक्त।
- बेहतर: 98% पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे, कानूनी सहायता बजट में 91% की राज्य हिस्सेदारी (सर्वाधिक)।
छत्तीसगढ़:
- खराब: जिला अदालतों में एक तिहाई पद खाली, पैरालीगल स्वयंसेवकों की संख्या आधी हो गई है, एक तिहाई जेलों में 150-250% से ज्यादा कैदी।
- बेहतर: जिला अदालतों और हाईकोर्ट दोनों में केस क्लीयरेंस रेट 100%, सभी पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क।
आपराधिक न्याय व्यवस्था की समग्र तस्वीर
उज्ज्वल पक्ष:
- 83% पुलिस स्टेशनों में कम से कम 1 सीसीटीवी कैमरा।
- 78% पुलिस थानों में महिला सहायता डेस्क।
- अधीनस्थ न्यायपालिका में 38% महिला न्यायाधीश।
- 8 राज्यों ने कैदियों और महिला डॉक्टरों का 1:300 का मानक पूरा किया।
- 86% जेलों में कम से कम एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा।
कमियां:
- पुलिस: 10,000 फोरेंसिक स्टाफ के पद खाली, पुलिस के कुल औसत बजट का केवल 1.25% प्रशिक्षण पर खर्च, 0 राज्य जिन्होंने पुलिस में महिलाओं का कोटा भरा।
- जेल: 176 जेलों में 200% या उससे ज्यादा ऑक्यूपेंसी, 20 से ज्यादा राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की जेलों में 20% से ज्यादा विचाराधीन कैदी 1-3 साल से बंद, 5.7 लाख कैदियों के लिए केवल 25 मनोचिकित्सक (25 राज्यों में पद ही नहीं)।
- कानूनी सहायता और न्यायपालिका: 2019 के बाद स्वयंसेवकों में 38% की कमी, केवल 4% केस ही मानवाधिकार आयोगों में स्वत: संज्ञान के, केवल कर्नाटक में न्यायपालिका और पुलिस में एससी-एसटी-ओबीसी का कोटा पूरा।
यह व्यापक विश्लेषण देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की चुनौतियों और कुछ क्षेत्रों में हुई प्रगति को दर्शाता है। स्टाफ की कमी, बुनियादी ढांचे की कमी और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दे तत्काल ध्यान देने की मांग करते हैं ताकि न्याय व्यवस्था को और अधिक प्रभावी और समावेशी बनाया जा सके।
