by-Ravindra Sikarwar
यरूशलेम: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इज़रायल की संसद (कनेसेट) में दिए गए महत्वपूर्ण भाषण के दौरान दो वामपंथी सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें संसद भवन से जबरन बाहर निकाल दिया गया। यह घटना मध्य पूर्व में शांति प्रयासों के बीच हुई, जब ट्रंप ने गाजा युद्धविराम समझौते को ऐतिहासिक सफलता बताते हुए भाषण दिया। विरोध करने वाले सांसदों ने फिलिस्तीन को मान्यता देने और इज़रायल की नीतियों के खिलाफ नारे लगाए, जिससे सत्र में कुछ देर के लिए हलचल मच गई।
घटना का विवरण:
ट्रंप सोमवार को कनेसेट में चौथे अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में भाषण दे रहे थे—2008 के बाद पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ऐसा किया। उनका भाषण गाजा में युद्धविराम समझौते पर केंद्रित था, जिसके तहत हमास ने 20 जीवित बंधकों को रिहा किया, जबकि इज़रायल ने लगभग 2,000 फिलिस्तीनी कैदियों को मुक्त किया। ट्रंप ने इस समझौते को “मध्य पूर्व के लिए नई सुबह का ऐतिहासिक उदय” करार दिया और इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सराहना की। उन्होंने अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकोफ और अपने दामाद जेरेड कुश्नर की भूमिका की भी प्रशंसा की, जिन्हें उन्होंने “लीक न करने वाले हेनरी किसिंजर” जैसे कुशल वार्ताकार बताया।
भाषण के बीच में अचानक दो सांसदों—अयमान ओदेह और ओफेर कैसिफ—ने हस्तलिखित तख्तियां उठाईं, जिन पर “फिलिस्तीन को मान्यता दो” (Recognize Palestine) लिखा था। ओदेह ने “नरसंहार बंद करो” (Stop the Genocide) जैसे नारे भी लगाए। यह विरोध तभी हुआ जब ट्रंप गाजा समझौते के विवरण बता रहे थे। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत कार्रवाई की और दोनों सांसदों को घसीटते हुए संसद भवन से बाहर ले जाया। वीडियो फुटेज में दिखा कि ओदेह को बीच में से खींचा गया, जबकि कैसिफ ने अपनी तख्ती को कसकर थामे रखा।
ट्रंप ने इस व्यवधान पर रुककर हास्यपूर्ण टिप्पणी की: “यह बहुत कुशलतापूर्वक किया गया।” (That was very efficient।) उनके इस बयान पर कनेसेट के अन्य सदस्यों ने तालियां बजाईं और “ट्रंप” के नारे लगाए। भाषण फिर से सुचारू रूप से जारी रहा, लेकिन घटना ने फिलिस्तीन-इज़रायल विवाद की गहराई को उजागर कर दिया।
विरोध करने वाले सांसद कौन हैं?
अयमान ओदेह और ओफेर कैसिफ हदाश-तaal गठबंधन पार्टी के सदस्य हैं, जो अरब-यहूदी संयुक्त राजनीतिक दल है। यह पार्टी इज़रायल की विपक्ष में पांच सीटें रखती है और अरब समुदाय (जो इज़रायल की आबादी का लगभग 20% है) के बीच दूसरी सबसे लोकप्रिय है।
- अयमान ओदेह: 50 वर्षीय अरब मूल के सांसद, जो हदाश-तaal के नेता हैं। वे फिलिस्तीनी अधिकारों, मिज़राही संस्कृति (इज़रायल के पूर्वी यहूदियों की परंपराओं) और अरब-यहूदी इतिहास के समर्थक हैं। नवंबर 2024 में उन्होंने नेतन्याहू को “शांति का सीरियल किलर” कहकर संसद से निष्कासित हो चुके हैं। भाषण से ठीक पहले उन्होंने कनेसेट को “पाखंड की बुलबुला” बताया और कहा कि नेतन्याहू को प्रशंसा देकर गाजा में “मानवता के खिलाफ अपराधों” को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
- ओफेर कैसिफ: यहूदी मूल के वामपंथी सांसद, जो फिलिस्तीनियों के प्रति इज़रायली नीतियों की कड़ी आलोचना करते हैं। उन्होंने सरकार की तुलना फासीवादी शासनों से की है, जिसके लिए पहले निलंबित हो चुके हैं। घटना के बाद कैसिफ ने सोशल मीडिया पर लिखा: “हमने व्यवधान नहीं किया, न्याय की मांग की। सच्ची शांति तभी आएगी जब कब्जा और अलगाववाद समाप्त हो और फिलिस्तीन राज्य की स्थापना हो।” उन्होंने इज़रायली नागरिकों से “खूनखराबे वाली सरकार” के खिलाफ विरोध करने का आह्वान किया।
दोनों सांसदों का कहना था कि उनका प्रदर्शन न्याय की मांग था, न कि भाषण बाधित करने का।
पृष्ठभूमि और प्रभाव:
यह घटना गाजा संघर्ष के संदर्भ में आई, जो 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से शुरू हुआ था। ट्रंप के 20-सूत्री शांति योजना के तहत फिलिस्तीन को संप्रभु राज्य बनाने की बात है, लेकिन नेतन्याहू ने फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता को खारिज कर दिया है। अमेरिका ने अभी फिलिस्तीन को राज्य के रूप में मान्यता नहीं दी है, जबकि अधिकांश अंतरराष्ट्रीय समुदाय ऐसा चाहता है।
समझौते में कुछ जटिलताएं भी रहीं: हमास ने 28 मृत बंधकों के शवों के बजाय केवल चार के रिहा करने की घोषणा की, जिसे इज़रायली रक्षा मंत्री इसराइल काट्ज ने “समझौते का घोर उल्लंघन” बताया। ट्रंप ने भाषण में इज़रायल के गोलान हाइट्स पर संप्रभुता मान्यता, ईरानी परमाणु समझौते से हटना और संयुक्त राष्ट्र में इज़रायल के समर्थन जैसे अपने पिछले फैसलों का जिक्र किया।
इस घटना ने कनेसेट में सख्त विरोध नियमों को रेखांकित किया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह इज़रायल की आंतरिक राजनीति में विभाजन को दर्शाती है, जहां अरब सदस्यों की आवाज अक्सर दबाई जाती है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया में बाधा के रूप में देखा, लेकिन ट्रंप ने इसे हल्के में लिया।
ट्रंप का इज़रायल दौरा हमास द्वारा अंतिम बंधकों की रिहाई के कुछ घंटों बाद हुआ, जो अमेरिका की मध्यस्थता का परिणाम था। यह घटना वैश्विक स्तर पर फिलिस्तीनी मुद्दे की प्रासंगिकता को फिर से उजागर करती है।
