by-Ravindra Sikarwar
27 सितंबर, 2025 को भारत ने अपने महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह की 118वीं जयंती को गहरे सम्मान और गर्व के साथ मनाया। इस अवसर पर देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों, सभाओं और श्रद्धांजलि समारोहों का आयोजन किया गया, जिसमें भगत सिंह के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ उनके साहसिक संघर्ष और बलिदान को याद किया गया। उनकी प्रेरणादायक विरासत, जो आज भी युवाओं को देशभक्ति और सामाजिक न्याय के लिए प्रेरित करती है, इस दिन विशेष रूप से रेखांकित की गई। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अन्य नेताओं और आम नागरिकों ने भगत सिंह के योगदान को नमन करते हुए उनके आदर्शों को अपनाने का संकल्प लिया।
भगत सिंह का जीवन और क्रांतिकारी सफर:
28 सितंबर, 1907 को पंजाब के लायलपुर (अब पाकिस्तान में फैसलाबाद) के बंगा गांव में एक देशभक्त सिख परिवार में जन्मे भगत सिंह ने कम उम्र में ही स्वतंत्रता संग्राम में कूदने का फैसला किया। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे, जिसने भगत सिंह को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत किया। 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार, जब वे केवल 12 वर्ष के थे, ने उनके मन में ब्रिटिश शासन के खिलाफ गहरी नाराजगी पैदा की। इस घटना ने उन्हें क्रांतिकारी बनने के लिए प्रेरित किया।
1920 के दशक में, भगत सिंह ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल होकर अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां शुरू कीं। बाद में, इसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के रूप में पुनर्गठित किया गया। भगत सिंह का मानना था कि केवल सशस्त्र क्रांति ही भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त करा सकती है। उन्होंने अपने साथियों—चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु और अन्य—के साथ मिलकर कई साहसिक कदम उठाए।
प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएं:
- 1928: सांडर्स हत्या: लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध कर रहे लाला लाजपत राय पर ब्रिटिश पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें उनकी मृत्यु हो गई। इसके जवाब में, भगत सिंह और उनके साथियों ने 17 दिसंबर, 1928 को सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सांडर्स की हत्या कर दी। यह कार्रवाई लाला जी की मौत का बदला लेने के लिए थी, और इसके जरिए क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।
- 1929: दिल्ली विधानसभा बम कांड: 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में दो बम फेंके, जो जानबूझकर खाली जगह पर फेंके गए ताकि कोई हताहत न हो। इसके बाद उन्होंने “इंकलाब जिंदाबाद” और “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” के नारे लगाए और स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी। उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जनता को जागरूक करना था।
- जेल में लेखन और विचार: जेल में रहते हुए, भगत सिंह ने कई लेख और पत्र लिखे, जिनमें “मैं नास्तिक क्यों हूं?” सबसे प्रसिद्ध है। उन्होंने समाजवाद, समानता और शोषण-मुक्त समाज की वकालत की। उनकी सोच मार्क्सवाद और समाजवादी विचारों से प्रभावित थी, और उन्होंने भारत में सामाजिक-आर्थिक सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया।
बलिदान और विरासत:
23 मार्च, 1931 को, केवल 23 वर्ष की उम्र में, भगत सिंह को उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु के साथ लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। उनकी फांसी ने पूरे देश में आक्रोश की लहर पैदा की और स्वतंत्रता संग्राम को नई गति दी। भगत सिंह की वीरता और विचारधारा ने उन्हें एक किंवदंती बना दिया, और आज भी उनके नारे “इंकलाब जिंदाबाद” और उनके लेख युवाओं को प्रेरित करते हैं।
118वीं जयंती पर आयोजन:
27 सितंबर, 2025 को भगत सिंह की जयंती पर देशभर में कई आयोजन हुए। प्रमुख गतिविधियां इस प्रकार थीं:
- पंजाब और हरियाणा: भगत सिंह के जन्मस्थान खटकड़ कलां (पंजाब) में हजारों लोग एकत्र हुए, जहां उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, “भगत सिंह का बलिदान हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्ष जरूरी है।” चंडीगढ़ में भगत सिंह मेमोरियल में सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रदर्शनियां आयोजित की गईं।
- दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में संसद भवन के पास भगत सिंह की प्रतिमा पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने श्रद्धांजलि अर्पित की। दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों ने “इंकलाब जिंदाबाद” थीम पर नुक्कड़ नाटक और सेमिनार आयोजित किए।
- मध्य प्रदेश: भोपाल और इंदौर में स्कूलों और कॉलेजों में भगत सिंह की जीवनी पर आधारित निबंध और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं हुईं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा, “भगत सिंह का जीवन युवाओं के लिए एक मशाल है, जो हमें अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देता है।”
- सोशल मीडिया और युवा: सोशल मीडिया पर #BhagatSinghJayanti और #InquilabZindabad ट्रेंड किया, जहां युवाओं ने भगत सिंह के लेखों और उनके प्रसिद्ध उद्धरणों को साझा किया। कई संगठनों ने उनके समाजवादी विचारों पर वेबिनार आयोजित किए।
नेताओं की श्रद्धांजलि:
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संदेश में कहा, “शहीद भगत सिंह का साहस और देशभक्ति की भावना हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता और न्याय के लिए बलिदान की कोई उम्र नहीं होती।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “भगत सिंह की निडरता और उनके विचार आज भी हमें एकजुट और मजबूत भारत के निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं।” विपक्षी नेता राहुल गांधी ने भी ट्वीट किया, “इंकलाब जिंदाबाद का नारा आज भी हमें सामाजिक अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ने की ताकत देता है।”
भगत सिंह की प्रासंगिकता आज:
भगत सिंह की विरासत केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं है। उनके समाजवादी विचार, सामाजिक समानता और शोषण-मुक्त समाज की कल्पना आज भी प्रासंगिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि भगत सिंह का जोर युवा सशक्तिकरण, शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता पर था, जो वर्तमान भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। उनके लेखों में जातिवाद, साम्प्रदायिकता और आर्थिक असमानता के खिलाफ आवाज आज के सामाजिक आंदोलनों को दिशा देती है।
निष्कर्ष: एक अमर प्रेरणा
शहीद भगत सिंह की 118वीं जयंती ने एक बार फिर उनके बलिदान और विचारों को देश के सामने ला खड़ा किया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति केवल नारों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह समाज में न्याय, समानता और स्वतंत्रता की स्थापना के लिए निरंतर संघर्ष की मांग करती है। भगत सिंह का “इंकलाब जिंदाबाद” आज भी भारत के कोने-कोने में गूंजता है, जो हमें एक बेहतर और मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रेरित करता है।
