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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: रूसी कच्चे तेल की लगातार खरीद को लेकर अमेरिका और भारत के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिका ने भारत से आयात होने वाली कई वस्तुओं पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है, जिसका कारण भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद जारी रखना बताया गया है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इससे रूस को आर्थिक मदद मिल रही है और यह यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में अस्वीकार्य है।

जयशंकर का तर्कों पर सवाल:
इस अमेरिकी कदम पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी ‘हैरानी’ और ‘परेशानी’ व्यक्त की है। उन्होंने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह समझना मुश्किल है कि अमेरिका इस तरह का कदम क्यों उठा रहा है। जयशंकर ने मॉस्को में अपने रूसी समकक्ष के साथ एक प्रेस वार्ता में स्पष्ट किया कि:

  1. भारत सबसे बड़ा आयातक नहीं: उन्होंने कहा कि रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार भारत नहीं, बल्कि चीन है। इसके अलावा, रूसी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का सबसे बड़ा खरीदार यूरोपीय संघ है।
  2. अमेरिका से भी बढ़ी है खरीद: जयशंकर ने यह भी बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की अमेरिका से तेल खरीद में भी वृद्धि हुई है, जो अमेरिका के लिए एक सुखद आश्चर्य होना चाहिए।
  3. अमेरिका के आग्रह पर खरीद: उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने खुद भारत से आग्रह किया था कि वह वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थिर रखने के लिए रूस से तेल खरीदना जारी रखे।

ट्रंप प्रशासन की चेतावनी:
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सहयोगी ने चेतावनी दी है कि भारतीय सामानों पर लगाए गए इस टैरिफ की समय सीमा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। अमेरिका का आरोप है कि भारत सस्ते रूसी तेल को खरीदकर उसे रिफाइन कर रहा है और भारी मुनाफा कमा रहा है, जिसे वे “मनी लॉन्ड्रिंग” का जरिया बता रहे हैं। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यूक्रेन युद्ध से पहले रूस का भारत के कुल तेल आयात में हिस्सा 1% से भी कम था, जो अब बढ़कर 35-42% तक पहुंच गया है।

भारत का रुख:
अमेरिका के दबाव और टैरिफ के बावजूद, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखेगा और रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा। भारत के सरकारी अधिकारियों ने कहा है कि ऊर्जा सुरक्षा उनके लिए प्राथमिकता है। इसके अलावा, रूस ने भी भारत को सस्ते दामों पर तेल की पेशकश की है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ हो रहा है। हाल ही में, जब अमेरिकी दबाव के कारण भारतीय कंपनियों ने रूसी तेल की खरीद कम की थी, तब चीन ने तुरंत उस हिस्से को खरीद लिया था, जिससे यह साबित होता है कि रूसी तेल के लिए हमेशा खरीदार मौजूद हैं।