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नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे द्वारा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लेकर दिए गए विवादित बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए दुबे के बयान को ‘गैरजिम्मेदाराना’ और ‘भड़काऊ’ करार दिया, लेकिन उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि दुबे का बयान ‘ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति’ को दर्शाता है और इसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतें ‘फूलों की तरह नाजुक’ नहीं हैं जो इस तरह के ‘हास्यास्पद’ बयानों से मुरझा जाएं। हालांकि, अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि सांप्रदायिक घृणा फैलाने या अभद्र भाषा का प्रयोग करने के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और इससे सख्ती से निपटा जाएगा।

विवादित बयान और याचिका:
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के वकील विशाल तिवारी द्वारा दायर एक जनहित याचिका से संबंधित है। तिवारी ने दुबे के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने और वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के संदर्भ में राजनीतिक नेताओं द्वारा की गई टिप्पणियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।

दरअसल, निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए कहा था, “अगर कानून सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा, तो संसद भवन को बंद कर देना चाहिए।” इसके बाद, उन्होंने मीडिया से बात करते हुए मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को लेकर एक और विवादित बयान दिया, जिसमें उन्होंने देश में हो रहे ‘गृह युद्धों’ के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया और आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है और धार्मिक युद्ध भड़का रहा है।

भाजपा के राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा ने भी इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि भारत के संविधान के अनुसार, कोई भी लोकसभा और राज्यसभा को निर्देशित नहीं कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दुबे का बयान ‘बेहद गैरजिम्मेदाराना’ है और ‘ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति’ को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि यह बयान ‘भड़काऊ भाषण’ के दायरे में आता है और इसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए, लेकिन अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि ‘अभद्र भाषा को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता’, क्योंकि इससे लक्षित समूह के सदस्यों की गरिमा और आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचती है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से ‘अदालत की गरिमा’ कम नहीं होगी।

यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अदालत की गरिमा बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने के सुप्रीम कोर्ट के प्रयास को दर्शाता है। यह मामला राजनीतिक नेताओं द्वारा दिए जाने वाले बयानों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर उनके संभावित प्रभाव के बारे में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है।